Wednesday, January 4, 2012

ch 9 संगणक है अलमारी -DTP done


राजकमल
भाग ९
संगणक  है अलमारी

अपने घर की अलमारी याद करो। इसमें कई खाने बने होते हैं और हम अपनी सुविधाके अनुसार वर्गीकरण करके उन खानोंमें  उस उस तरह की चीजे रखते हैं। कभी किसी खानेमें ताला लगानेकी सुविधा हो तो हम अपनी कीमती वस्तुएँ  उस खानेमें रखते हैं। कभी कभी हम कुछ वस्तुओं की गठरी  बाँधकर रखते हैं और ऐसी कई गठरियाँ अलमारी में रख सकते हैं। संगणक के साथ कुछ ऐसा ही करते हैं।
पहले हम संगणकके प्रोग्राम, फाइलें (धारिका) और फोल्डर ( संचिका या गठरी) को समझेंगे। हरेक प्रोग्राम एक तंत्र होता है जो कोई तज्ज्ञ विकसित करता है। खास खास कामके लिये खास प्रोग्राम होता है पर कई स्टॅण्डर्ड  प्रोग्राम भी होते हैं। प्रोग्रामके सहारे हम जब भी काम करेंगे तब उसकी एक धारिका बनेगी। ऐसी धारिकाओंको एकत्रित रखनेके लिये उन्हें संचिकामें (फोल्डरमें) रखते हैं।

सामान्यतया हम संगणकके कार्यकारी बक्से CPU को खोलकर नही देखते। हार्डवेअरकी पढाई करनेवाले देखते हैं। वैसे हम भी सरलता से देख सकते हैं क्यों कि  बक्से का बाजूका फ्लॅप या ढक्कन एक स्क्रू ड्राइवर से खोला जा सकता है।

इस CPU के अंदर अलग- अलग काम करने वाले उपकरण लगे होते हैं जैसे कई प्रकारके चिप, पीसीबी सर्क्टिस इत्यादि। इसमें सर्वप्रमुख है संगणक का मस्तिष्क अर्थात प्रोसेसर चिप। इसे भी अपने कामको संभालनेके लिये एक स्लेट चाहिये, जो रॅम डिस्क है और हमारे किये काम की फाईलें संभाल कर, संग्रहित कर रखनेके लिये हार्ड डिस्क होती है। प्रोसेसर और हार्ड डिस्कके लिये अच्छे हिंदी शब्द हैं -- विवेचक और संग्राहक।
संगणक खरीदते समय ही तय करना पडता है कि हमारी संगणकरूपी अलमारी अर्थात् संग्राहक डिस्क (हार्ड डिस्क) कितनी बडी होगी। जब हम उसे घर लाकर पहली बार सेटिंग करते हैं तभी संग्राहक डिस्कके दो या तीन भाग बना लेना चाहिये।
इन भागोंको    C, D  और E  ड्राइव नाम देने का प्रचलन हैं। C ड्राइवमें सभी सॉफ्टवेअर प्रोग्राम  रखे जाते हैं। कभी कभी वे खराब हो जाते हैं तब  C  ड्राइवसे सारी फाइलें हटाकर दुबारा सभी प्रोग्राम लोड करने पडते हैं। इन प्रोग्रामों की सीडी भी मिल जाती है और उन्हें दुबारा लोड करने में कोई दिक्कत भी नही है। लेकिन इन प्रोग्रामों पर काम करके जो फाइलें हम बनाते हैं, उन्हें C  के बजाय  D  या E   ड्राइवमें रखना चाहिये ताकि जब हमें C  ड्राइवकी सफाई करनी हो, तब फाइलें सुरक्षित रहें। माय डॉक्यूमेंट और डेक्सटॉप, दोनों ही C  ड्राइव्हका हिस्सा हैं और बार बार काम करना हो तो सुविधाके लिये कई फाइलें सामान्यतया इन्ही में रखी जाती हैं। इसीलिये बीच बीच में फाइलों को वहाँ से निकालकर  D  ड्राइवमें नई संचिकाएँ अर्थात् गठरी बनाकर उनमें रखना जरूरी है।

एक ही तरह की फाइलों को एक गठरीमें रखनेमें सुविधा है। इसके लिये हम संगणक पर कोई नई संचिका (न्यू फोल्डर) बना कर और उसे अच्छासा नाम देकर उसी विषयसे संबंधित धारिकाएँ (फाइलें) उसमें रख देते हैं। फिर यदि एक गठरी या संचिका (फोल्डर) को उठाकर दूसरे ड्राइव में  या दूसरी संचिकामें रखते हैं तो उसकी सभी फाइलें अपने आप उधर चली जाती हैं। वरना उन्हें एक एक करके उठाकर रखना पडता।

इंटरनेट से हम फाइलें तो भेज सकते हैं लेकिन गठरी (फोल्डर) नही। इसलिये यदि हम फोल्डर को झिप (zip) करें तो वह गठरी भी एक झिप-फाइल बन जाती है, फिर उसे इंटरनेट पर भेजा जा सकता है। दूसरे सिरे पर उस फाइल को डाऊनलोड करके अनझिप करने पर गठरी और उसमें बाँधकर रखी धारिकाएँ वहाँ उपलब्ध हो जाती हैं।

अलमारी की ही तरह संगणक में भी ताला लगाने की व्यवस्था है। ताला किसी भी फाइलमें, या फोल्डरमें, या ड्राइवमें या फिर पूरे संगणकपर भी लगाया जा सकता है। ताला खोलनेकी चाबीको गुप्तशब्द कहा जाता है।

हर फाइल के लिये अलग अलग गुप्तशब्द हो सकता है, या फिर पूरे फोल्डर के लिये, या पूरे ड्राइव के लिये और फिर भी चाहें तो  पूरे संगणक को खोलने के लिये भी गुप्तशब्द का उपयोग किया जा सकता है। ऐसा होने पर केवल वही व्यक्ति इन्हें खोलकर पढ सकेंगे जिन्हें गुप्तशब्द पता हो।

सामान्यतया हमें संगणक के प्रयोग में इतनी गुप्तता की आवश्यकता नही होती। लेकिन बँक, सुरक्षा से संबंधित फाइलें, कंपनियों के व्यवहार इत्यादि में गुप्तता की आवश्यकता होती है। ऐसे समय यह सुविधा काम आती है।
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Chp- 9

संगणक  है अलमारी

अपने घर की अलमारी याद करो। इसमें कई खाने बने होते हैं और हम अपनी सुविधाके अनुसार वर्णीकरण करके उन खानोंमें  उस तरह की चीजे रखते हैं। कभी किसी खानेमें ताला लगानेकी सुविधा हो तो हम अपनी कीमती वस्तुएँ  उस खानेमें रखते हैं। कभी कभी हम कुछ वस्तुओं की गठरी  बाँधकर रखते हैं और ऐसी कई गठरियाँ अलमारी में रख सकते हैं। संगणक के साथ कुछ ऐसा ही करते हैं।
पहले हम संगणकके प्रोग्राम, फाइलें (धारिका) और फोल्डर ( संचिका या गठरी) को समझेंगे। हरेक प्रोग्राम एक तंत्र होता है जो कोई तज्ज्ञ विकसित करता है। खास खास कामके लिये खास प्रोग्राम होता है पर कई स्टॅण्डर्ड  प्रोग्राम भी होते हैं। इनके सहारे हम जब भी काम करेंगे तब उसकी एक धारिका बनेगी। ऐसी धारिकाओंको एकत्र रखनेके लिये उन्हें संचिकामें रखते हैं।

सामान्यतया हम संगणकके कार्यकारी बक्से CPU को खोलकर नही देखते। हार्डवेअरकी पढाई करनेवाले देखते हैं। वैसे हम भी सरलता से देख सकते हैं क्यों कि  बक्से का बाजूका फ्लॅप या ढक्कन एक स्क्रू ड्राइवर से खोला जा सकता है।
इस CPU के अंदर अलग- अलग काम करने वाले उपकरण लगे होते हैं जैसे चिप, पीसीबी सर्क्टिस इत्यादि। इसमें सर्व प्रमुख हैं संगणक का मस्तिष्क अर्थात प्रोसेसर चिप। इसे भी अपने कामको संभालनेके लिये एक स्लेट चाहिये, जो रॅम डिस्क है और हमारे किये काम की फाईलें संग्रहित कर रखने के लिये हार्ड डिस्क। प्रोसेसर और हार्ड डिस्कके लिये अच्छे हिंदी शब्द हैं -- विवेचक और संग्राहक।
संगणक खरीदते समय ही तय करना पडता है कि हमारी संगणक रूपी अलमारी अर्थात् संग्राहक डिस्क (हार्ड डिस्क) कितनी बडी होगी। जब हम उसे घर लाकर पहली बार सेटिंग करते हैं (या विक्रेता का इंजिनियर आकर कर देता हो, तभी संग्राहक डिस्कके दो या तीन भाग बना लेना चाहिये।
इन्हें   C, D  और E  ड्राइव्हका नाम देने का प्रचलन हैं। C ड्राइव्ह में सभी सॉफ्टवेअर प्रोग्राम  रखे जाते हैं। कभी कभी वे खराब हो जाते हैं तब  C  ड्राइव्हसे सारी फाइलें हटाकर दुबारा उस पर सभी प्रोग्राम लोड करने पडते हैं। इन प्रोग्रामों की सीडी भी मिल जाती है और उन्हें दुबारा लोड करने में कोई दिक्कत भी नही है। लेकिन इन प्रोग्रामों पर काम करके जो फाइलें हम बनाते हैं, उन्हें C  के बजाय  D  या E   ड्राइव्ह में रखना चाहिये ताकि जब हमें C  ड्राइव्ह की सफाई करनी हो , तब फाइलें सुरक्षित रहें। माय डॉक्यूमेंट और डेक्सटॉप, दोनों ही C  ड्राइव्हका हिस्सा हैं और बार बार काम करना हो तो सुविधाके लिये कई फाइलें सामान्यतया इन्ही में रखी जाती हैं। इसीलिये बीच बीच में फाइलों को वहाँ से निकालकर  D  ड्राइव्ह में डालना जरूरी है।

एक ही तरह कि फाइलों को एक गठरी में रखने में सुविधा है। इसके लिये हम संगणक पर कोई नई संचिका (न्यू फोल्डर) बना कर और उसे अच्छासा नाम देकर उसी एक प्रकारकी  मनचाही धारिकाएँ ( फाइलें) उसमें रख देते हैं। फिर यदि एक गठरी अर्थात संचिका (फोल्डर) को उठाकर दूसरे ड्राइव्ह में (या दूसरी संचिका में) रखते हैं तो उसकी सभी फाइलें अपने आप उधर चली जाती हैं। वरना हमें उन्हें एक एक करके उठाकर रखना पडता।

इंटरनेट से हम फाइलें तो भेज सकते हैं लेकिन गठरी(फोल्डर) नही। इसलिये यदि हम फोल्डर को झिप करें तो वह गठरी भी एक झिप-फाइल बन जाती है और उसका आकार भी छोटा हो जाता है । फिर उसे इंटरनेट पर भेजा जा सकता है। दूसरे सिरे पर उस फाइल को डाऊनलोड करके अनझिप करने पर गठरी और उसमें बाँधकर रखी धारिकाएँ वहाँ उपलब्ध हो जाती हैं।

अलमारी की ही तरह संगणक में भी ताला लगाने की व्यवस्था है। ताला किसी भी फाइल में, या फोल्डर में, या ड्राइव्ह में या फिर पूरे संगणक पर भी लगाया जा सकता है। ताला खोलनेकी चाबीको गुप्तशब्द कहा जाता है।

हर फाइल के लिये अलग अलग गुप्तशब्द हो सकता है, या फिर पूरे फोल्डर के लिये, या पूरे ड्राइव्ह के लिये और फिर भी चाहें तो  पूरे संगणक को खोलने के लिये भी गुप्तशब्द का उपयोग किया जा सकता है। ऐसा होने पर केवल वही व्यक्ति इन्हें खोलकर पढ सकेंगे जिन्हें गुप्तशब्द पता हो।

सामान्यतया हमें संगणक के प्रयोग में इतनी गुप्तता की आवश्यकता नही होती। लेकिन बँक, सुरक्षा से संबंधित फाइलें, कंपनियों के व्यवहार इत्यादि में गुप्तता की आवश्यकता होती है। ऐसे समय यह सुविधा काम आती है।
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