Saturday, September 2, 2017

संगणककी जादुई दुनिया भाग - ५ व ६ स्नेह बालपत्रिका हेतु संगणक है पोस्टमन - जनवरी २०२०

स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया

भाग -   


स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया भाग-

संगणक है पोस्टमन - जनवरी २०२०

संगणक केवल पोस्टमन ही नही बल्कि डाक- विभाग ही है, क्योंकि डाक विभागके अनेक काम करता है। यही हमारे घरका लेटर-बॉक्स है, यही घरमें डाक लानेवाला डाकिया है, यही डाकघरका पोस्टमास्तर है और पत्रोंको एक पतेसे दूसरेतक पहुँचानेवाला हवाई जहाज या कूरियर भी यही है

संगणक यह सारे काम टेलीफोन विभागकी मददसे करता है । जैसे हम टेलीफोन विभागमें पैसे भरकर एक टेलीफोन घरपर ले आते हैं, वैसे ही थोडे और पैसे भरकर एक मोडेम या उसका बडा भाई राऊटर भी ले आते हैं

राऊटर या मोडेम यंत्रको एक तारसे टेलीफोनके सॉकेटमें जोडते हैं। इथरनेट केबल नामक दूसरी तार संगणकके कार्यकारी बक्सेमें मोडेमके लिये बने प्लगमें जोडते हैं। राउटरमें वाईफाई होता है तो उसे इथरनेट केबलकी आवश्यकता नही होती। जो संदेश हम भेजते हैं वह संगणकसे राउटरमें, वहाँसे टेलीफोन-तारों द्वारा टेलीफोन एक्सचेंजमें, वहाँसे दूरदराजके शहरके टेलीफोन एक्सचेंजमें, वहाँसे हमारे मित्रके राउटरमें और फिर मित्रके संगणकमें पहुँचता है। अर्थात् यदि अपने संगणकको पोस्टमन बनाकर उसके द्वारा दुनियाँ भरमें संदेश भेजने हों, तो पहले अपने संगणकमें एक राऊटर लगाना पडेगा।
लेकिन केवल इतनेसे बात नही बनेगी, कुछ और प्रयास भी करने पडेंगे। सबसे पहले संगणकपर लिखा गया संदेश राउटरतक पहुँचानेके लिये एक्सप्लोअरर नामक सॉफ्टवेअरकी आवश्यकता होगी। आजकलके सर्वाधिक प्रचलित सॉफ्टवेअर जैसे, गूगलक्रोम, फायरफॉक्स और इंटरनेट एक्सप्लोअरर प्रायः संगणककी ऑपरेटिंग सिस्टममें ही लगे होते हैं। तो ये हुआ हमारे संदेशको डाकघरतक पहुँचानेका काम।

लेकिन किसीको डाक- व्यवस्थापन भी करना पडेगा। तो याद रखना कि एक्सप्लोअरर बनानेवाली कंपनियाँ अलग होती हैं और संदेश व्यवस्थापन करनेवाली कंपनियाँ अलग। आजकलकी प्रचलित कंपनियाँ हैं गूगल, याहू, हॉटमेल, रेडिफ मेल इत्यादि।

तो तुमने देखा कि यह काम तीन जगहोंपर बँटा हैं। एक तो टेलीफोनी क्षेत्रमें काम करनेवाली वे कंपनियाँ जिनके बिछाये तार, यंत्र, इत्यादि उपकरण हमारे संदेशको इलेक्ट्रानिकीके माध्यमसे लाते- ले जाते हैं। दूसरा हमारे और मित्रके संगणकमें लगा एक्सप्लोअरर और तीसरा संदेशोंका व्यवस्थापन करनेवाली कंपनियाँ। इसे हम डाकघरकी तुलनासे ऐसे समझें कि मुंबईसे दिल्ली जानेवाले पत्र तो हवाई जहाजसे चले जायेंगे। लेकिन किस व्यक्तिके पतेपर पहुँचाना है, उस पतेपर पहुँचनेका रास्ता डाकियेको मालूम है या नही, पत्र पर डाक- टिकट लगा है या नही, पता न मिलने पर डाकको वापस लौटाना, इत्यादि सारे कामोंका व्यवस्थापन पोस्ट विभागके कर्मचारी करते हैं - इसके लिये एक व्यवस्था बनाते हैं। उसी तरह गूगल, याहू इत्यादि कंपनियाँ हमारे संदेशोंका व्यवस्थापन करती हैं।

अपने घरके संगणकमें राऊटर जोडकर जब हम गूगलक्रोम या फायरफॉक्स खोलते हैं, तो अपने आप ही व्यवस्थापन कंपनीमेंसे किसीका पता उस पर लिखकर आ जाता है। यदि नही आये तो हम स्वयं लिख सकते हैं। साधारणतया इसका स्वरूप https://www.gmail.com इस प्रकारका होता है। इसे उस कंपनीका संकेतस्थल कहते हैं। बस समझ लो कि यही उस कंपनीका हेड ऑफिस है।

अब यदि हमें यह स्वीकार है कि हमारे संदेशोंका व्यवस्थापन यह कंपनी करेगी तो सबसे पहले उन्हें अपनी इच्छा बतानी पडेगी, उनकी शर्तें माननी पडेंगी। उन्हें अपनी कोई पहचान भी बतानी पडेगी और अपना पता भी देना पडेगा ताकि वे अपनी सूचीमें हमारा नाम भी रजिस्टर कर लें।
तो मित्रों, अगले अंकमें हम ये सारे काम करनेकी पद्धतिको समझेंगे।
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स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया भाग-
संगणक है मेरी डाकपेटी -- फरवरी २०२०

मित्रों, पिछले अंकमें हमने समझा कि संगणकपर डाकप्रणाली चलानेके लिये उसकी ऑपरेटिंग सिस्टममें बैठा क्रोम जैसा एक्सप्लोअरर चाहिये जो हमारे संदेशको संगणकीय भाषामें बदलकर उसे भेजनेलायक बनाता है। फिर संगणक-- राऊटर--टेलीफोन एक्सचेंज--दूर शहरका टेलीफोन एक्सचेंज--हमारे मित्रका राऊटर--उसका संगणक इतने रास्तोंसे संदेश पहुँचानेके लिये टेलीफोनके तार या मोबाईल टॉवर या उपग्रह ( सॅटेलाइट) चाहिये। तीसरी, संदेशोंका व्यवस्थापन करनेवाली गूगल या याहू जैसी कंपनी भी चाहिये। एक उपयोगकर्ताके रूपमें हमारा संबंध इन्हीं व्यवस्थापक कंपनियोंसे है।
नसे जुडनेका तरीका यों है कि अपने एक्सप्लोअररमें जाकर किसी कंपनीका संकेत स्थल खोलो। साधारणतया इसका स्वरूप https://www.gmail.com इस प्रकारका होता है। तुरंत उस कंपनीका संक्षिप्त परिचय देनेवाला एक पन्ना खुलेगा जिसमें हमें रजिस्ट्रेशनके लिये निमंत्रण भी होगा । जहाँ कहीं लिखा हो साइन-अप, वहीं हमे टिकटिकाना है। फिर एक नया पन्ना खुलेगा जो वास्तव में रजिस्ट्रेशन का फॉर्म है। इसमें हमारी कुछ प्राथमिक जानकारी पूछी जायगी और संकेतनाम और गुप्तशब्द भी पूछा जायेगा। जरूरी नहीं है कि संकेतनामके लिये हम अपना असली नाम लिखें। जैसे मैंने गूगल कंपनीके साथ अपना संकेतनाम दिया है avahan जबकि मेरा नाम है leena mehendale । अब मुझे अपना गुप्तशब्द भी चुनकर उन्हें बताना है। तो मान लो कि मैंने गुप्तशब्द चुना jayhind इस प्रकार मेरा ईमेल का पता हुआ avahan@gmail.com और मेरा गुप्तशब्द हुआ jayhind । फॉर्म भर लेनेपर उसी पन्ने के नीचे लिखा Submit बटन भी टिकटिकाना है। इससे गूगलपर मेरा रजिस्ट्रेशन हो गया। यह रजिस्ट्रेशन आरंभ में एक बार ही करना पडता है, बार-बार नही। हाँ, अपना गुप्तशब्द हम कभी भी बदल सकते हैं - बशर्ते उन्हें बताकर बदलें ।
इस प्रकार गूगलपर मेरा खाता खुल गया और रजिस्टर हो गया। अब कभी भी मैं गूगलका संकेतस्थल खोलूं तो Sign up के बजाय Sign in को टिकटिकाउंगी। इससे एक नई खिडकी खुलेगी जिसमें दो खाली जगहें होंगी। पहलेमें मुझे लिखना है अपना संकेतनाम avahan और दूसरी में jayhind। ये दोनों अंग्रेजीमें लिखने पडेंगे। जब हम गुप्तशब्द लिखते हैं तो संगणकपर केवल ***** अर्थात् बिन्दू बिन्दू ही दिखेंगे--- हमारा गुप्तशब्द नही दिखेगा। इसलिये अगल बगल में कई लोग हों भी, तो वे संगणक पर मेरा गुप्तशब्द नही पढ पायेंगे। हमें अपना ईमेल पता तो सबको बताना चाहिये ताकि लोग संदेश भेज सकें लेकिन गुप्तशब्द कभी नही बताना चाहिये।
हम एक ही कंपनी के साथ कई संकेतनामोंसे रजिस्टर हो सकते हैं- और कई कंपनियों के साथ भी। जिस प्रकार हमारा डाकपता कई दूसरे कामों के लिये उपयोगी होता है इसी प्रकार ईमेल पता भी कई कामोंके लिये उपयोगी होता है।

इस उदाहरणमें मेरा ईमेल पता हुआ avahan@gmail.com और गुप्तशब्द हुआ jayhind । यहाँ @ को at the rate of पढा जाता है और यह अक्षर इतना कारगर हो गया है कि सभी की-बोर्डों पर इसकी कुञ्जी होती ही है।

यदि मैं किसी भी संगणकमें गूगलका संकेतस्थल खोलकर sign in की पंक्तियोंमें अपना संकेतनाम और गुप्तशब्द लिखूँ तो मेरी व्यक्तिगत डाकपेटी (इनबॉक्स) का पन्ना लेगा। उसमें “Compose mail” बटन को टिकटिकाने पर एक नया पन्ना खूलेगा जिसमें पत्र की ही तरह बाकायदा पता लिखने की जगह और संदेश लिखने के लिये अलग जगह होगी। इसमें संदेश लिखकर यदि मैंने पते की पंक्ति में लिखा avahan@gmail.com तो वह पत्र मुझे ही भेजा जायगा। अब यदि मैं उसी पन्ने पर बाँई ओर लिखे inbox के बटन को टिकटिकाउँ तो मैं अपना पत्र पढ सकती हूँ। अपने मित्र को पत्र भेजना हो तो उसका ईमेल पता लिखना पडेगा।
मेरे ईमेल पते पर मुझे कोई भी पत्र भेज सकता है। लेकिन मेरी डाकपेटी खोलने के लिये मेरा गुप्तशब्द चाहिये जो केवल मुझे ज्ञात है।
इस प्रकार ईमेल का काम सीखने में अधिक समय नही लगता। यहाँ लिखा विवरण पढने में जितनी देर लगी उससे कम समय में यह सब कुछ सीखा जा सकता है।


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Sunday, June 11, 2017

संगणककी जादुई दुनिया भाग - 4 पांच मिनटोंमें सीखो कम्प्यूटर पर हिंदी लिखना


स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया भाग - 4

संगणक है टाइप राइटर
अर्थात् पांच मिनटोंमें सीखो 
कम्प्यूटर पर हिंदी टाइपिंग


मित्रों, अब तो स्कूलोंमें संगणक (कम्प्यूटर) सिखाया जाने लगा है और तुममेंसे कईयोंके घर में भी होगा। तो क्या तुम जानते हो कि संगणक पर हिंदी टंकण सीखने के लिये एक युक्ति है जिसे समझनेके लिये केवल आधा घंटा पर्याप्त है। वह भी अंग्रेजी पर निर्भरता के बिना। और अगर पूरी बात कहूँ तो हरेक भारतीय भाषा सीखनेकी यही युक्ति है।
इस युक्तिका नाम है इनस्क्रिप्ट की-लेआउट अर्थात् संगणकके की-बोर्ड या कुंजीपटलका एक विशिष्ट क्रम जिसे हमारे पहली कक्षामें पढे वर्णक्रमकी भाँति ही रखा गया है। इसे सीखनेसे पहले तुम्हें बस पहली बार अपने संगणकको बताना है कि आगेसे तुम्हे अंगरेजीके साथसाथ हिंदी -देवनागरीका पर्याय भी चाहिये।
तो तुम यह युक्ति सीख सकते हो।




तो पहले संगणकको इस प्रकार तैयार करो -- start --> setting -> control panel --> Region and
Language --> Add language
एक खिडकी खुलेगी जिसके ड्रॉप-डाउन मेन्यू पर लिखा होगा - ENG. मेन्यूमें संसारकी बीसियों भाषाएँ मिलेंगी, उसमेंसे हिंदीको क्लिक करो और अप्लाय तथा ओके के बटन भी दबाओ।। ऐसा करते ही संगणकके सबसे नीचेवाली पट्टी- टास्क-बार पर EN लिखा दीखने लगेगा और वहाँ क्लिक करनेपर हिंदी का पर्याय भी दिखेगा।
यह काम केवल सबसे पहली बार करना है -- बारबार नही।
अब पहले वर्ड फाईल खोलकर फिर हिन्दी का पर्याय चुनो और कोई भी कुंजी दबाओ तो हिंदी अक्षर मिलेंगे।
इस प्रकार तुम्हारा संगणक तैयार हो गया और तुम इनस्क्रिप्ट विधीसे हिंदी टंकण सीखना आरंभ कर सकते हो।

यह चित्र देखो जिसमें इनस्क्रिप्ट ले-आऊट बताया गया है।
इस लेआऊटमें वर्णोंका क्रम वैसे ही चलता है जैसा हमने पहली कक्षामें पढा होता है -- अर्थात् अआइईउऊ या कखगघ..., चछजझ...इत्यादि। अतः कुंजियाँ खोजनेकी दिक्कत नही है, जो अंग्रेजी सीखनेमें है । साथही इसमें तमाम व्यंजन दहिने और स्वरकी मात्राएँ बाँये हाथसे लगानेका चलन है, जिससे अपनेआप एक तबले जैसी लय बँध जाती है और थोडीही प्रॅक्टिसमें तुम शीघ्र गतिसे टंकका काम कर सकते हो।
अब चिन्ता छोडो की तुम्हारे कुंजीपटलपर हिंदी स्टिकर तो लगे ही नही हैं -- बस निश्चिंत होकर आरंभ करो, अपना कुंजीपटल देखो और सीखो यह युक्ति --
पहले दो मिनटोंमें सीखो बीस अक्षर
कख-गघ --- कुंजीपटलके अंग्रेजी अक्षर K-I की जोडी देखो जो बीचवाली दो लाइनोंमें नीचे-ऊपर है। यही कख और गघ हैं।
तथ- दध --- अगली दो कुंजियाँ L-O हैं, यही जोडी तथ, दध के लिये हैं,
चछ- जझ --- अगली जोडी चछ,जझ की

टठ -डढ --- और उससे अगली टठ डढ की।
-, पफ-बभ -- से बाँई ओर J-U की जोडीसे-ह लिखते हैं और उससे बायें H-Y की जोडीपर पफ, बभ हैं।
कुंजियोंकी ये जगहें समझकर आत्मसात् करनेको दो मिनट पर्याप्त हैं।
याद रखना कि कठिन (भारी) अक्षरके लिये (अर्थात् खघ,थध,छझ,ठढ,फभ) कुंजीके साथ शिफ्टकी कुंजी भी दबानी होगी।
अगले दो मिनटोंमें सीखो और बीस अक्षर

बाँईं ओर की पाँच कुंजी-जोडियों बाराखडी के दस स्वरोंके लिये हैं। इन्हे भी हमने पहली कक्षामें रटा था --
अआइईउऊएऐओऔअंअः
अ आ – अंग्रेजी अक्षर DE की जोडी जो नीचे-ऊपर है।
इ ई – FR की जोडी
उ ऊ – GT की जोडी
ए ऐ – SW की जोडी
ओ औ – AQ की जोडी
इनका क्रम ओऔ,एऐ,अआ,इई,उऊ रखा गया है क्योंकि इसमे सुविधा है। यहाँ मैंने अंग्रेजी अक्षर केवल पहली बार जगह बताने के लिये लिखे हैं, याद करने के लिये नही। अंगरेजी अक्षरकी बजाये ऐसे याद रखो-- तीसरी जोडी, बाँयेंसे पहली जोडी, दहिनी चौथी जोडी इत्यादि।
शिफ्टकुंजी के साथ लिखनेपर स्वतः स्वर लिखा जाता है परन्तु किसी व्यंजनकी मात्रा लगाने के लिये शिफ्ट कुंजी आवश्यक नही है
इस प्रकार दस मात्राएँ तथा उन्हें लगाने का तरीका समझने के लिये अगले दो मिनट पर्याप्त हैं।
इन कुंजियोंको समझकर यदि हम प्रॅक्टिस करें --
काकी, चाची, दादी, ताई, ताऊ, बाबा, पापा, काका, चाचा, टाटा, दीदी -- तो इस कुंजीरचनाकी सरलता
तत्काल मोह लेती है।
बचे अक्षरोंको अर्थात मनवलसषय को सबसे नीचली पंक्तिमें एक बार ढूँढ कर समझा जा सकता है।
इसी तरह सबसे ऊपरी पंक्तिमें शिफ्टके साथ ५,,,, अंकोंकी कुंजियोंसे ज्ञ त्र क्ष श्र तथा + की कुंजीसे ऋ लिखते हैं।
सबसे निचली पंक्तिमें तिसरी कुंजीसे आरंभ कर शिफ्ट के साथ म लिखनेपर , , , शिफ्ट के साथ ल लिखनेपर मराठी, कन्नड आदि भाषाओंका ळ, शिफ्ट के साथ स लिखनेसे), ष तथा अन्तिम कुंजीपर य हैं।
शिफ्ट के साथ ड से अगली कुंजी पर ञ और ह की कुंजीसे ङ लिखते हैं।
अनुस्वार के लिये अक्षर लिखने के बाद अंग्रेजी X की कुंजी लगाना। इसे शिफ्टके साथ लगानेपर चंद्रबिंदु लगता है।
जरासे अभ्याससे ये याद हो जाते हैं।

संयुक्त अक्षर
संस्कृत के नियमानुसार व्यंजन में अ लगाकर उसे पूरा किया जाता है। जब कि यहाँ किसी भी कुंजीसे पूर्ण व्यंजन लिखा जाता है ताकि अ की मात्रा बारबार न लगानी पडे। अतः इस कुंजीपटलमें व्यंजनके बाद अ की कुंजी - Dअक्षर टंकण करनेपर वहाँ हलन्त लगता है और अगला व्यंजन उसमें जुड जाता है।

यदि लिखना हो क्रम तो क , हलन्त ,,
परंतु कर्म लिखने के लिये क, , हलन्त , म लिखा जायगा।
कृपा लिखनेके लिये क में ऋ की मात्रा (बिना शिप्ट के) और विसर्ग चिह्न के लिये शिफ्टके साथ - की कुंजी
लगती है।
संगणक के सामने बैठकर लिखने लगो तो यह सब पढनेमें जितना समय लगता है उससे आधे समय में ही यह सब सीखा जाता है। नीचे शिफ्टकुंजी के बिना और शिफ्टकुंजी के साथवाले कीबोर्ड के चित्र अलग अलग दिखाये हैं।
तो बस सीखो हिंदी फटाफट टंकण और भेजो मुझे ईमेल मेरा पता है -- leena.mehendale@gmail.com । ईमेल हिंदीमें लिखना।
यदि संभव हो तो इनस्क्रिप्ट सीखनेका एक विडियो भी देखो जो मैंने अपनी यूट्यूबपर रखा है। इसका लिंक है -- https://www.youtube.com/watch?v=0YspgTEi1xI&t=181s
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Friday, June 9, 2017

स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया १-३


स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया
भाग - 1 संगणक क्या है
आजकल संगणक या कम्प्यूटर शब्दसे कौन अनजान है? कईयोंने इसे देखा है और इसपर काम भी किया है। कम्प्यूटरका हिंदी नाम पडा संगणक अर्थात जो समुचित ढंगसे गणना या गणित कर सके। कम्प्यूटरका पहला पहला काम यही था। बादमें उसने कई दूसरे काम भी सीखे। इस बातको भी अब ७०-८० वर्ष होनेको आये।
फिर भी किसीसे अचानक पूछो कि संगणक क्या है, तो वह गडबडायेगा जरूर। जिसने इसपर काम नही किया है वे सोचते हैं कि भैया, ये तो बडा महंगा होगा, और सीखना भी अपने बसका नही.... फिर जिन्होंने संगणकपर सुविधासे काम करना सीख लिया वे हँसते हैं -- "अरे, यह तो बडा ही सरल है।" वैसे तो अब मोबाइल संगणकका गठजोड हो जानेके कारण कई काम मोबाइलपर ही हो जाते हैं लेकिन जिसने संगणकपर कोई काम किया हो उसे अब भी यह रहस्य ही लगता है।
अर्थात् संगणक ऐसी वस्तु है जिसे कोई कठिन कहेगा तो कोई सरल, कोई कहेगा निरर्थक खर्चा तो कोई कहेगा सार्थक। तो आओ पहले समझें कि संगणक क्या है।
दरअसल संगणक एक यंत्र है ये हुई ना सरलसी बात?



संगणककी सबसे पहली पहचान यही है कि यह एक यंत्र है। दिनभरमें तुम कितने यंत्र देखते होगे। सायकल यंत्र है - पैडल मारनेसे चलती है और हमें यहाँ-वहाँ घुमाती है। घडी भी यंत्र है जो चाबी या बैटरी पर चलती है ओर समय बताती है। फ्रिज, टीवी, मोबाईल, लिफ्ट, कार, पम्प, ये सब यंत्र हैं।
गाँवके कुओंपर चलनेवाले रहट, बोअरवेल और उसका हॅण्डपम्प, स्प्रिंकलर, स्प्रे पम्प, आटेकी चक्की, ट्रॅक्टर, ये सभी यंत्र है।
लेकिन संगणक एक जादूगर यंत्र है। क्योंकि उसके पास एक मस्तिष्क हैं -- अब है तो वह यांत्रिक मस्तिष्क, पर मस्तिष्ककी महत्ता रखता है, विभिन्न प्रकारके काम भी कर लेता है। अन्य यंत्रोंकी तरह नही कि एक ही काम कर सके। संगणक लिख सकता है, पढता है, गाने सुनाता है, फिल्म दिखाता है, फिल्म बनाता है, चित्र आँकता है, हमारे साथ खेलता है, दुनियाके एक कोनेसे दूसरे कोनेतक पलभरमें संदेश पहुँचाता है और हाँ, बडे-बडे गणित सुलझाता है। चाँदतक पहुँचनेमें हमारी मदद भी करता है। इसीलिये यह सीधासादा नही बल्कि जादूगर यंत्र है।
तो अगले अंकसे हम इसकी एक एक जादू सीखते चलेंगे। तब तुम देखोगे कि मोबाइल भी इसमेंसे बहुतसे काम कर लेता है पर सारे काम नही करता। यदि तुम्हारे घर या स्कूलमें संगणक है तो ये सारी जादू तुम फटाफट सीख लेना।
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स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया
भाग जादूगर या अडियल टट्टू

संगणक है युक्तियोंभरा जादूगर यंत्र इसलिये कई बार लोगोंको इससे डर लगता है उन्हें लगता है कि वे कोई गलत बटन दबा देंगे और बडा अनर्थ हो जायेगा। स्कूलमें भी शिक्षकोंको लगता है कि बच्चे कोई गलत बटन दबा देंगे तो ये खराब हो जायेगा।

तो सबसे पहले हमे समझ लेना चाहिये कि संगणक का कोई बटन दब गया और उसमें कोई गडबडी हुई ऐसा साधारणतया कम ही होता है। प्रायः नही हे बराबर!

लेकिन संगणककी एक समस्या है। इसका हर काम एक विशेष तरीकेसे और विशेष क्रमसे होता है। जहाँ हमसे उस क्रममें जरासी चूक हुई कि संगणक अडियल टट्टूकी तरह अड जाता है। फिर वह आगे चलेगा ही नही। आपको अगला क्रम पता हो तो आप दो- चार बार प्रयास करेंगे, फिर कहेंगे मारो गोली, यह नही चल रहा है। फिर इसे सीखनेका उत्साह समाप्त हो जाता है और फिर हम उससे कतराने लगते हैं।

हमें केवल इतना जानना है कि जो काम हम संगणकसे करवाना चाहते हैं, उस कामका क्रम कैसा रहेगा। वास्तवमें यह इतना सरल है कि पाँच- छह बार करने लेनेपर 
इसकी समझ ही जाती है और आदत भी पड जाती है। जिस तरह जादूगर बडे आरामसे और युक्तिसे हर एकको अपने जादूसे प्रभावित करता है, उसी तरह जब संगणककी युक्तियाँ हमारी समझमें जाती हैं तब हम भी इठलाकर इससे जादूकी तरह झटपट काम करवाते हैं।


तो सीखनी है केवल कई छोटी छोटी युक्तियाँ। और हां, यदि कोई दोस्त थोडी देर साथ आये, रहे, और ये युक्तियाँ सिखा दे तो संगणक और भी सरल हो जाता है लेकिन तब हमारा भी कर्तव्य बन जाता है कि हम भी किसी औरको ऐसेही दोस्ती निभाते हुए संगणक सिखायें।

संगणकको ऐसे समझो कि ये है तुम्हारी स्लेट पेन्सिल स्लेट पेन्सिलका सबसे अच्छा गुण यह है कि स्लेटपर पेन्सिलसे कुछ भी लिखो, पर जैसेही उसे मिटा डाला, स्लेट फिर कोरी हो जाती है - नई लिखाईके लिये तैयार। फिर इसपर नया गणित करो या नया चित्र बनाओ।

संगणक भी कोरी स्लेटकी तरह होता है। और मजा ये कि एक जादुई तरीकेसे इस स्लेटकी लंबाई और चौडाई खींचकर बढाई घटाई जा सकती है - वह तरीका भी मैं आगे बतानेवाली हूँ इसीलिये संगणकपर बडेबडे लेख, बडे चित्र या बडी सारणियाँ बनाई जा सकती हैं। जो भी लिखा है उसके बीचमें कहीं गलती दिखे तो उतनी छोटीसी गलतीको मिटाकर वहाँ सही लिख दो। और यदि सारा ही गलत लिखा गया हो तो भी कोई बात नही, सारा पोंछ कर दुबारा लिखा जा सकता है।

स्लेट पेन्सिलपर लिखनेके लिये तीन चीजें चाहिये - एक स्लेट, दूसरी पेन्सिल, और तीसरा हमारा दिमाग - जो बतायेगा कि क्या लिखना है। संगणककी स्लेट पर लिखनेके लिये इन तीन बातोंके साथ साथ संगणकका मस्तिष्क भी उपयोगमें लाना पडता है। अगली बार इस मस्तिष्कको समझेंगे।

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स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया -- भाग 3


संगणक है स्लेट पेन्सिल
पिछली बार मैंने बताया कि संगणकको एक स्लेट-पेन्सिल जैसा समझो। लेकिन आओ, इसके मस्तिष्कको भी समझते हैं।
संगणकका मस्तिष्क है उसकी प्रोसेसर चिप । जैसे मोबाइलकी चिप होती है, वैसीही चिप परन्तु अत्यधिक शक्तिशाली अर्थात जो बडी बडी संग्रहित जानकारीको बहुत तेजीसे खंगालकर काम कर सके। इसे व अन्य कुछ उपकरणोंको एक बडे बोर्डपर जोडकर धूल धक्कडसे बचानेके लिये उसे एक डिब्बेके अंदर बंद कर देते हैं जिसे हम सीपीयू या सेंट्रल प्रोसेसिंग युनिट कहते हैं। इसे कार्यकारी बक्सा भी कह सकते हैं। संगणकसे संबंधित नब्बे प्रतिशत काम इसी कार्यकारी बक्सेमें लगी प्रोसेसर चिप व अन्य उपकरणोंकी सहायतासे होते हैं। बक्सेमें हो रहे कामको हम मॉनीटर या स्क्रीनपर देखते हैं और कामका निर्देश देनेके लिये की-बोर्ड और माऊसका उपयोग करते हैं।
यदि हम बडे संगणककी जगह लॅपटॉप खरीदते हैं तो इसका सीपीयू या बक्सा एक पतली पुस्तकके आकारमें बना होता है, उसीके ऊपर कीबोर्ड भी बैठा देते हैं और ढक्कनमें ही स्क्रीन लगा देते हैं। और अब तो कंपनियाँ बिलकुल छोटे डिब्बोंमें सीपीयू बना रही हैं, अर्थात जगहकी बचत।
इन सभी उपकरणोंको एकत्रित रूपमें हम जड-वस्तू-प्रणाली या यंत्र- प्रणाली कह सकते हैं ताकि हमें बोध होता रहे कि संगणकमें मंत्र और तंत्रकी भी प्रणालियाँ होती हैं। संगणकके सभी सॉफ्टवेअरोंको हम मंत्र-प्रणाली कह सकते हैं और उसके आधार पर काम करनेकी पध्दतीको तंत्र- प्रणाली। इस प्रकार संगणकमें यंत्र-मंत्र-तंत्र तीनों हैं, जबकि बाकी यंत्रोमें केवल यंत्र होता है। इसी कारण संगणक कई प्रकारके काम कर सकता है। यही है जादू।
पहले केवल यंत्रकी बात करते हैं ताकि स्लेट पेन्सिलकी बात पूरी हो जाये। जब हम हम नया संगणक या लॅपटॉप लाते हैं तो हमारे सामने चार बातें होती हैं -- कार्यकारी बक्सा, मॉनीटर या स्क्रीन, की-बोर्ड और माऊस।
कार्यकारी बक्सेके अंदर बैठी संगणककी प्रोसेसर चिप उसका मस्तिष्क है, संगणकका मॉनीटर या स्क्रीन हमारी स्लेट है, और की-बोर्ड तथा माऊस दोनों मिलकर बनती है पेन्सिल। अब जब भी संगणक पर काम करना हो तो याद रखना कि यह तो केवल एक स्लेट है जिसपर तुम कुछ भी लिख सकते हो - यदि लगे कि गलत लिखा तो उसे मिटा दो, और यदि लगे सही लिखा है तो संभालकर रख लो।
तो आओ, सबसे पहले संगणकका कार्यकारी बक्सा, पडदा अर्थात स्क्रीन या मॉनिटर, कुञ्जीपाटी (की बोर्ड) और माउसके कामको समझते हैं।
कार्यकारी बक्सा और स्क्रीन दोनों ही बिजलीसे चलते हैं, सो पहले दोनोंके लिये बिजलीका बटन दबाओ। ये दोनों आपसमें भी तारसे जोडने पडते हैं। यदि तुम्हारे पास लॅपटॉप है तो उसमें कार्यकारी बक्सा, पडदा व कुञ्जीपटल सब अन्दरसे आपसमें जुडे रहते हैं। फिर संगणककी प्रोसेसर चिप व अन्य अंदरूनी भागोंको आरंभ करनेके लिये जो दूसरा बटन लगा होता है, उसे भी चालू करो। अब करीब एक मिनटमें संगणक अपनी अंदरूनी चिपोंको तैयार करेगा और फिर तुम्हारे आदेशकी प्रतीक्षा करेगा। उतना समय उसे देना पडता है।
माउसको चलाना
हमारे घरमें माउसको प्यारसे मूषक ही कहते हैं। हम जो भी सूचना संगणकको देना चाहते हैं, वह कुञ्जीपाटी और मूषकके माध्यमसे देते हैं। जब हम टेबुलपर मूषक को दायें-बायें, ऊपर-नीचे सरकाते हैं तो पडदेपर भी एक सूचक या कर्सर (बाणके आकारमें) उसी प्रकारसे सरकता है। जो काम करना है, जहाँसे करना है, वहाँ बाणको ले आओ और संगणकको सूचना देनेमें लग जाओ। मूषक अच्छी तरह सरके इसलिये उसे माउसपॅडपर रखकर चलाते हैं।
एक बात और। बिलकुल पहले दिन मूषक को चलाना सीखना पडता है। टेबुलपर उसकी छोटीसी हरकतसे भी बाण कहींसे कहीं भागता है, कभी तो पडदेसे बाहर भी हो जाता है। पर धैर्यसे सीखो कि कैसे बाणको ऊपर-नीचे, व दायें-बायें सरकाते हैं। ब तुम्हें मजा आने लगेगी।
मूषककी रचनाको ठीकसे देखो कैसी है। मूषक की पीठपर एक चक्री होती है जो तर्जनी उँगलीसे ऊपर नीचे घुमाई जा सकती है। उसके दोनों ओर दो बडे बटन होते हैं। बाँया बटन टिकटिकाने या क्लिक करनेसे किसी फाइलका काम आरंभ होता है, परन्तु दाँया बटन क्लिक करनेसे उस फाइलसे संबंधित अन्य काम किये जा सकते हैं, यथा उसकी प्रतियाँ बनाना, उसका नाम बदलना, किसीको भेजना इत्यादि। किसी फाइलका पन्ना खुला हो तो चक्री घुमाकर उसे तेजीसे ऊपर-नीचे सरकाया जा सकता है।
तुमने क्या सूचना दी और संगणकने क्या समझा यह हम पडदेपर देख सकते हैं। लेकिन याद रहे कि संगणकको आरंभ करनेपर हमें यह पडदा कोरा नही दिखता बल्कि उसपर कई चित्राकृतियाँ बनीं होती हैं। क्योंकि संगणक केवल स्लेट नही, और भी बहुत कुछ है तो उसके कुछ कामोंकी सूची भी पडदेपर लिखी होती है। इन चित्राकृतियोंको संगणककी भाषामें आयकॉन कहते हैं।
पडदेको डेस्कटॉप भी कहते हैं। कहाँसे आया यह शब्द ? अपने कामका डेस्क याद करो। उसपर काम करनेकी कई फाइलें रखी होती लेकिन हैं। किसी फाइलपर काम आरंभ करनेसे पहले हम कामसे संबंधित कुछ बातें जुटाकर रख लेते हैं -- जैसे पेन, पेन्सिल, रबर, शब्दकोष, कंपास, पानीका गिलास (जिसकी जैसी जरूरत हो)। इसी प्रकार संगणकके डेस्कटॉपपर भी बार बार किये जानेवाले कामोंकी चित्राकृतियाँ रखी जाती हैं। तुम्हे जो काम करना हो उसकी चित्राकृति पर मूषक के सहारे बाणको लाकर टिकटिकानेसे उस कामके लिये एक पन्ना खुलता है औऱ तुम वह काम शुरू कर सकते हो
संगणकके सभी सॉफ्टवेअर, प्रोग्राम या फाइलें हम डेस्कटॉपपर नही रखते । केवल उन्हींको रखते हैं जिनका काम हमें बार बार करना होता है। फाइलोंको बीचबीचमें डेस्कटॉपसे हटाकर संगणकमें ही दूसरी योग्य जगहपर रखते रहना एक अच्छी आदत है
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