Friday, June 9, 2017

स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया १-३


स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया
भाग - 1 संगणक क्या है
आजकल संगणक या कम्प्यूटर शब्दसे कौन अनजान है? कईयोंने इसे देखा है और इसपर काम भी किया है। कम्प्यूटरका हिंदी नाम पडा संगणक अर्थात जो समुचित ढंगसे गणना या गणित कर सके। कम्प्यूटरका पहला पहला काम यही था। बादमें उसने कई दूसरे काम भी सीखे। इस बातको भी अब ७०-८० वर्ष होनेको आये।
फिर भी किसीसे अचानक पूछो कि संगणक क्या है, तो वह गडबडायेगा जरूर। जिसने इसपर काम नही किया है वे सोचते हैं कि भैया, ये तो बडा महंगा होगा, और सीखना भी अपने बसका नही.... । फिर जिन्होंने संगणकपर सुविधासे काम करना सीख लिया वे हँसते हैं -- "अरे, यह तो बडा ही सरल है।" वैसे तो अब मोबाइल व संगणकका गठजोड हो जानेके कारण कई काम मोबाइलपर ही हो जाते हैं लेकिन जिसने संगणकपर कोई काम न किया हो उसे अब भी यह रहस्य ही लगता है।
अर्थात् संगणक ऐसी वस्तु है जिसे कोई कठिन कहेगा तो कोई सरल, कोई कहेगा निरर्थक खर्चा तो कोई कहेगा सार्थक। तो आओ पहले समझें कि संगणक क्या है।
दरअसल संगणक एक यंत्र है। ये हुई ना सरलसी बात?



संगणककी सबसे पहली पहचान यही है कि यह एक यंत्र है। दिनभरमें तुम कितने यंत्र देखते होगे। सायकल यंत्र है - पैडल मारनेसे चलती है और हमें यहाँ-वहाँ घुमाती है। घडी भी यंत्र है जो चाबी या बैटरी पर चलती है ओर समय बताती है। फ्रिज, टीवी, मोबाईल, लिफ्ट, कार, पम्प, ये सब यंत्र हैं।
गाँवके कुओंपर चलनेवाले रहट, बोअरवेल और उसका हॅण्डपम्प, स्प्रिंकलर, स्प्रे पम्प, आटेकी चक्की, ट्रॅक्टर, ये सभी यंत्र है।
लेकिन संगणक एक जादूगर यंत्र है। क्योंकि उसके पास एक मस्तिष्क हैं -- अब है तो वह यांत्रिक मस्तिष्क, पर मस्तिष्ककी महत्ता रखता है, और विभिन्न प्रकारके काम भी कर लेता है। अन्य यंत्रोंकी तरह नही कि एक ही काम कर सके। संगणक लिख सकता है, पढता है, गाने सुनाता है, फिल्म दिखाता है, फिल्म बनाता है, चित्र आँकता है, हमारे साथ खेलता है, दुनियाके एक कोनेसे दूसरे कोनेतक पलभरमें संदेश पहुँचाता है और हाँ, बडे-बडे गणित सुलझाता है। चाँदतक पहुँचनेमें हमारी मदद भी करता है। इसीलिये यह सीधासादा नही बल्कि जादूगर यंत्र है।
तो अगले अंकसे हम इसकी एक एक जादू सीखते चलेंगे। तब तुम देखोगे कि मोबाइल भी इसमेंसे बहुतसे काम कर लेता है पर सारे काम नही करता। यदि तुम्हारे घर या स्कूलमें संगणक है तो ये सारी जादू तुम फटाफट सीख लेना।
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स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया
भाग – २ जादूगर या अडियल टट्टू

संगणक है युक्तियोंभरा जादूगर यंत्र । इसलिये कई बार लोगोंको इससे डर लगता है। उन्हें लगता है कि वे कोई गलत बटन दबा देंगे और बडा अनर्थ हो जायेगा। स्कूलमें भी शिक्षकोंको लगता है कि बच्चे कोई गलत बटन दबा देंगे तो ये खराब हो जायेगा।

तो सबसे पहले हमे समझ लेना चाहिये कि संगणक का कोई बटन दब गया और उसमें कोई गडबडी हुई ऐसा साधारणतया कम ही होता है। प्रायः नही हे बराबर!

लेकिन संगणककी एक समस्या है। इसका हर काम एक विशेष तरीकेसे और विशेष क्रमसे होता है। जहाँ हमसे उस क्रममें जरासी चूक हुई कि संगणक अडियल टट्टूकी तरह अड जाता है। फिर वह आगे चलेगा ही नही। आपको अगला क्रम पता न हो तो आप दो- चार बार प्रयास करेंगे, फिर कहेंगे मारो गोली, यह नही चल रहा है। फिर इसे सीखनेका उत्साह समाप्त हो जाता है और फिर हम उससे कतराने लगते हैं।

हमें केवल इतना जानना है कि जो काम हम संगणकसे करवाना चाहते हैं, उस कामका क्रम कैसा रहेगा। वास्तवमें यह इतना सरल है कि पाँच- छह बार करने लेनेपर 
इसकी समझ आ ही जाती है और आदत भी पड जाती है। जिस तरह जादूगर बडे आरामसे और युक्तिसे हर एकको अपने जादूसे प्रभावित करता है, उसी तरह जब संगणककी युक्तियाँ हमारी समझमें आ जाती हैं तब हम भी इठलाकर इससे जादूकी तरह झटपट काम करवाते हैं।


तो सीखनी है केवल कई छोटी छोटी युक्तियाँ। और हां, यदि कोई दोस्त थोडी देर साथ आये, रहे, और ये युक्तियाँ सिखा दे तो संगणक और भी सरल हो जाता है। लेकिन तब हमारा भी कर्तव्य बन जाता है कि हम भी किसी औरको ऐसेही दोस्ती निभाते हुए संगणक सिखायें।

संगणकको ऐसे समझो कि ये है तुम्हारी स्लेट पेन्सिल। स्लेट पेन्सिलका सबसे अच्छा गुण यह है कि स्लेटपर पेन्सिलसे कुछ भी लिखो, पर जैसेही उसे मिटा डाला, स्लेट फिर कोरी हो जाती है - नई लिखाईके लिये तैयार। फिर इसपर नया गणित करो या नया चित्र बनाओ।

संगणक भी कोरी स्लेटकी तरह होता है। और मजा ये कि एक जादुई तरीकेसे इस स्लेटकी लंबाई और चौडाई खींचकर बढाई – घटाई जा सकती है - वह तरीका भी मैं आगे बतानेवाली हूँ। इसीलिये संगणकपर बडेबडे लेख, बडे चित्र या बडी सारणियाँ बनाई जा सकती हैं। जो भी लिखा है उसके बीचमें कहीं गलती दिखे तो उतनी छोटीसी गलतीको मिटाकर वहाँ सही लिख दो। और यदि सारा ही गलत लिखा गया हो तो भी कोई बात नही, सारा पोंछ कर दुबारा लिखा जा सकता है।

स्लेट पेन्सिलपर लिखनेके लिये तीन चीजें चाहिये - एक स्लेट, दूसरी पेन्सिल, और तीसरा हमारा दिमाग - जो बतायेगा कि क्या लिखना है। संगणककी स्लेट पर लिखनेके लिये इन तीन बातोंके साथ साथ संगणकका मस्तिष्क भी उपयोगमें लाना पडता है। अगली बार इस मस्तिष्कको समझेंगे।

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स्नेह मासिकके लिये धारावाही -- संगणककी जादुई दुनिया -- भाग 3


संगणक है स्लेट पेन्सिल
पिछली बार मैंने बताया कि संगणकको एक स्लेट-पेन्सिल जैसा समझो। लेकिन आओ, इसके मस्तिष्कको भी समझते हैं।
संगणकका मस्तिष्क है उसकी प्रोसेसर चिप । जैसे मोबाइलकी चिप होती है, वैसीही चिप परन्तु अत्यधिक शक्तिशाली अर्थात जो बडी बडी संग्रहित जानकारीको बहुत तेजीसे खंगालकर काम कर सके। इसे व अन्य कुछ उपकरणोंको एक बडे बोर्डपर जोडकर धूल धक्कडसे बचानेके लिये उसे एक डिब्बेके अंदर बंद कर देते हैं जिसे हम सीपीयू या सेंट्रल प्रोसेसिंग युनिट कहते हैं। इसे कार्यकारी बक्सा भी कह सकते हैं। संगणकसे संबंधित नब्बे प्रतिशत काम इसी कार्यकारी बक्सेमें लगी प्रोसेसर चिप व अन्य उपकरणोंकी सहायतासे होते हैं। बक्सेमें हो रहे कामको हम मॉनीटर या स्क्रीनपर देखते हैं और कामका निर्देश देनेके लिये की-बोर्ड और माऊसका उपयोग करते हैं।
यदि हम बडे संगणककी जगह लॅपटॉप खरीदते हैं तो इसका सीपीयू या बक्सा एक पतली पुस्तकके आकारमें बना होता है, उसीके ऊपर कीबोर्ड भी बैठा देते हैं और ढक्कनमें ही स्क्रीन लगा देते हैं। और अब तो कंपनियाँ बिलकुल छोटे डिब्बोंमें सीपीयू बना रही हैं, अर्थात जगहकी बचत।
इन सभी उपकरणोंको एकत्रित रूपमें हम जड-वस्तू-प्रणाली या यंत्र- प्रणाली कह सकते हैं ताकि हमें बोध होता रहे कि संगणकमें मंत्र और तंत्रकी भी प्रणालियाँ होती हैं। संगणकके सभी सॉफ्टवेअरोंको हम मंत्र-प्रणाली कह सकते हैं और उसके आधार पर काम करनेकी पध्दतीको तंत्र- प्रणाली। इस प्रकार संगणकमें यंत्र-मंत्र-तंत्र तीनों हैं, जबकि बाकी यंत्रोमें केवल यंत्र होता है। इसी कारण संगणक कई प्रकारके काम कर सकता है। यही है जादू।
पहले केवल यंत्रकी बात करते हैं ताकि स्लेट पेन्सिलकी बात पूरी हो जाये। जब हम हम नया संगणक या लॅपटॉप लाते हैं तो हमारे सामने चार बातें होती हैं -- कार्यकारी बक्सा, मॉनीटर या स्क्रीन, की-बोर्ड और माऊस।
कार्यकारी बक्सेके अंदर बैठी संगणककी प्रोसेसर चिप उसका मस्तिष्क है, संगणकका मॉनीटर या स्क्रीन हमारी स्लेट है, और की-बोर्ड तथा माऊस दोनों मिलकर बनती है पेन्सिल। अब जब भी संगणक पर काम करना हो तो याद रखना कि यह तो केवल एक स्लेट है जिसपर तुम कुछ भी लिख सकते हो - यदि लगे कि गलत लिखा तो उसे मिटा दो, और यदि लगे सही लिखा है तो संभालकर रख लो।
तो आओ, सबसे पहले संगणकका कार्यकारी बक्सा, पडदा अर्थात स्क्रीन या मॉनिटर, कुञ्जीपाटी (की बोर्ड) और माउसके कामको समझते हैं।
कार्यकारी बक्सा और स्क्रीन दोनों ही बिजलीसे चलते हैं, सो पहले दोनोंके लिये बिजलीका बटन दबाओ। ये दोनों आपसमें भी तारसे जोडने पडते हैं। यदि तुम्हारे पास लॅपटॉप है तो उसमें कार्यकारी बक्सा, पडदा व कुञ्जीपटल सब अन्दरसे आपसमें जुडे रहते हैं। फिर संगणककी प्रोसेसर चिप व अन्य अंदरूनी भागोंको आरंभ करनेके लिये जो दूसरा बटन लगा होता है, उसे भी चालू करो। अब करीब एक मिनटमें संगणक अपनी अंदरूनी चिपोंको तैयार करेगा और फिर तुम्हारे आदेशकी प्रतीक्षा करेगा। उतना समय उसे देना पडता है।
माउसको चलाना
हमारे घरमें माउसको प्यारसे मूषक ही कहते हैं। हम जो भी सूचना संगणकको देना चाहते हैं, वह कुञ्जीपाटी और मूषकके माध्यमसे देते हैं। जब हम टेबुलपर मूषक को दायें-बायें, ऊपर-नीचे सरकाते हैं तो पडदेपर भी एक सूचक या कर्सर (बाणके आकारमें) उसी प्रकारसे सरकता है। जो काम करना है, जहाँसे करना है, वहाँ बाणको ले आओ और संगणकको सूचना देनेमें लग जाओ। मूषक अच्छी तरह सरके इसलिये उसे माउसपॅडपर रखकर चलाते हैं।
एक बात और। बिलकुल पहले दिन मूषक को चलाना सीखना पडता है। टेबुलपर उसकी छोटीसी हरकतसे भी बाण कहींसे कहीं भागता है, कभी तो पडदेसे बाहर भी हो जाता है। पर धैर्यसे सीखो कि कैसे बाणको ऊपर-नीचे, व दायें-बायें सरकाते हैं। तब तुम्हें मजा आने लगेगी।
मूषककी रचनाको ठीकसे देखो कैसी है। मूषक की पीठपर एक चक्री होती है जो तर्जनी उँगलीसे ऊपर नीचे घुमाई जा सकती है। उसके दोनों ओर दो बडे बटन होते हैं। बाँया बटन टिकटिकाने या क्लिक करनेसे किसी फाइलका काम आरंभ होता है, परन्तु दाँया बटन क्लिक करनेसे उस फाइलसे संबंधित अन्य काम किये जा सकते हैं, यथा उसकी प्रतियाँ बनाना, उसका नाम बदलना, किसीको भेजना इत्यादि। किसी फाइलका पन्ना खुला हो तो चक्री घुमाकर उसे तेजीसे ऊपर-नीचे सरकाया जा सकता है।
तुमने क्या सूचना दी और संगणकने क्या समझा यह हम पडदेपर देख सकते हैं। लेकिन याद रहे कि संगणकको आरंभ करनेपर हमें यह पडदा कोरा नही दिखता बल्कि उसपर कई चित्राकृतियाँ बनीं होती हैं। क्योंकि संगणक केवल स्लेट नही, और भी बहुत कुछ है। तो उसके कुछ कामोंकी सूची भी पडदेपर लिखी होती है। इन चित्राकृतियोंको संगणककी भाषामें आयकॉन कहते हैं।
पडदेको डेस्कटॉप भी कहते हैं। कहाँसे आया यह शब्द ? अपने कामका डेस्क याद करो। उसपर काम करनेकी कई फाइलें रखी होती लेकिन हैं। किसी फाइलपर काम आरंभ करनेसे पहले हम कामसे संबंधित कुछ बातें जुटाकर रख लेते हैं -- जैसे पेन, पेन्सिल, रबर, शब्दकोष, कंपास, पानीका गिलास (जिसकी जैसी जरूरत हो)। इसी प्रकार संगणकके डेस्कटॉपपर भी बार बार किये जानेवाले कामोंकी चित्राकृतियाँ रखी जाती हैं। तुम्हे जो काम करना हो उसकी चित्राकृति पर मूषक के सहारे बाणको लाकर टिकटिकानेसे उस कामके लिये एक पन्ना खुलता है औऱ तुम वह काम शुरू कर सकते हो।
संगणकके सभी सॉफ्टवेअर, प्रोग्राम या फाइलें हम डेस्कटॉपपर नही रखते । केवल उन्हींको रखते हैं जिनका काम हमें बार बार करना होता है। फाइलोंको बीचबीचमें डेस्कटॉपसे हटाकर संगणकमें ही दूसरी योग्य जगहपर रखते रहना एक अच्छी आदत है
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Saturday, December 31, 2016

मणिपुरी वर्णाक्षर


मणिपुरी
कोक सम लाइ मित पा ना चिन
तिल खौ डौ थौ वाइ याङ हुक
उन ई फम अतिया गोक झम राइ
बा जिल दिल, घौ धौ भम





कोक (सिर), सम (केस), लाइ (कपाल), मित (आँख), पा (पलक), ना (नाक), चिन (ओंठ),
तिल (जीभ) खौ (गला), डौ (कण्ठ), थौ (छाती), वाइ (वाहू), याङ (रीढ), हुक (ऊरपिंजर),
उन (त्वचा), ई (रक्त), फम (नाल), अतिया (आकाश), गोक(*), झम (डफली), राइ(*),
बा(*), जिल(*), दिल(*), घौ (ढोल), धौ(*), भम(*).

Monday, December 26, 2016

SANGANAK--USE THIS MATTER FOR CORRECTIONS


SANGANAK 1
एकूण कांय तर १
आपल्या देशांत आता डिजिटल इंडियाचे वारे वाहू लागले आहेत संगणकामार्फत खूप सुविधा दिल्या जाणार आहेत . म्हणून आपण याची तोंड ओळख करून घ्यायला हवी.१
म्हणून माझ विचारचक्र सुरू झाल ,की यांना कस समजवायच?३
एकदा काही जणांनी मला सांगितले ३
आधी समजून घ्यावे५
हल्ली लॅपटॉप वापरणे जास्त सोईचे झाले आहे .त्याची सुरवात देखील त्याच्याकडील पॉवरचे बटण दाबूनच होते.६
नव्या प्रकारच्या स्क्रीनचे चित्र६
नुकताच लोकप्रिय झालेला खेळ म्हणजे पोकेमॅन .शिवाय अगदी लहान मुलांनाही गुंगवून ठेवील असेही खेळ असतात.१०
ब्राउझिंगची आणि प्रव्यक्ष संदेशवहनाची १२
आणि इंटरनेट एक्स प्लोअरर हे१२
आता प्रत्यक्ष ई पत्रव्यवहार करण्यासाठी काय करावे लागते ते पाहू.१२
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SANGANAK 2
चिप -?चकती ,पट्टी , फीत-??३८
रिलोड -पुनस्थापना ३८
अपलोड- जालस्थापना३८
 डाऊनलोड-स्थलस्थापना (भूस्थापन) ३८
  संगणक आपल्याला विचारतो की या फाइली कुठे ठेऊ
?३८
असा एक कप्पा३९
सामान्यपणे तिथेच साठवतो.३९
त्याचा संग्राहक बराच मोठा घ्यावा लागतो.४०
कामांची एक यादी उघडते४०
इंटरनेट -महाजाल४१
इलेक्ट्रिक संदेशांना (पर्यायाने ध्वनि संदेशांना देखील)४१
झोन असेल तर तिथल्या तिथे बोलले जाते व SMS वर संदेश वाचता येतो.४३
रेडियो तरंग आणि सॅटेलाइट वरुन काही प्रवास तारांमधून होतो.४३
आपण त्यावर वैयक्तिक असे वर्णन केले असेल तर तो इतरांना वाचता येत नाही.४४
आपल्या ढगाची पब्लिक किंवा सार्वजनिक असे आपण म्हटले असेल तर ४४
त्यांना एक वर्तुळकारांत मांडायच आणि ९ नंतर४६
पैकी फक्त एक एवढाच माहित आहे४७
दशांश पद्धतीचे४७
आणि खरोखरच द्विअंश पद्धतीत २०ही संख्या १०१०००अशी लिहिली जाते ४८
पहा ६हीच संख्या दोन्ही उत्तरात  आली४८
चे ढीग तयार करता येतील४८
प्रत्येक तारेला वेगवेगळा वीजपुरवठा केला जातो. या चित्रातील पेटलेल्या बल्प वरून आपण हा आकडा लिहू-०१००१०१० याचा गणिती अर्थ ७४ असा होईल पण अक्षर म्हणून समजायचे असेल तर Jहे अक्षर असेल५०
त्यांना  कोटयावधी सिग्नल वेगळेपणाने ओळखू येतात५०
मानवी भाषेत बदलू शकतो ५०
इंग्रजीत जास्त वापराव्या लागणा-या अक्षरांना ५१
कुठल्याही दशांश आकड्याला झटकन द्विअंश आकडयांत बदलण्याची एक लघू -गुरू पद्धत वेदिक गणितात दिलेली आहे.तर ५२
आता या सर्व भाषांमधे वैयक्तिक वापराप्रमाणेच प्रकाशन क्षेत्रातही झपाटयाने काम होऊ लागले आहे ५५
२५६ मधे बसवता आली५४
सोळा तारांची बस वापरात येण्याआधी५५
प्रयोग केला गेला ५५
 व पाच सात सुंदरसे५५
२००६मायक्रोसॉफ्टच्या विण्डोज ७ या ५५
ही प्रत्येक भारतीय भाषेसाठी युनीकोड स्टॅण्डर्डचा एक-एक फॉण्ट उपलब्ध झाला आहे५५
 या तुलनेत भारतीय भाषा मात्र दुर्दैवी ठरल्या५६
त्यांचा कॉपीराइट ठेवला नाही ५८
संगणक विकासात अगदी सुरवातीला ५९
तसे होऊ नये एकेक कामाचा प्रोग्रॅम लिहायला काही दिवस लागत  असत ५९
 पण ज्यांना तयार हत्यारांमधून तेवढे नेमकेच काम करायचे असेल त्यांना विण्डोज सोईची आहे. ५९
यातील प्रत्यक्ष वापरणा-याने करायच्या कामाखेरीज इतर सर्व टप्पे एकत्रपणे Stanslandisc करून os व वरून५९
सर्वाधिक श्रीमंत म्हणुन ६०
इत्यादी सर्व ६०
टेलीफोन तारांमार्फत मोठया प्रमाणात व जगभरात सुठ करण्यांत आले६०
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SANGANAK 3
तिच्या मार्फत काम करायचे तर थोडे प्रोग्रॅमिंग यायला हवे मग सरकारी लोक बिचकतात ते म्हणतात आम्हाला सांगू नका आम्ही कोणी तज्ञ्ज्ञ नाही आणा कुणीतरी तज्ञ्ज्ञ आणि त्याच्याकडून काम करून घ्या  नाहीतर पडू दे ते संगणक तसेच बिनकामाचे६२
हे सर्व भाग आपल्याला समोर दिसतात६२
तिच्या अधिक क्षमतेचा फायदा घेत६५
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SANGANAK 4  
गतीचक्र   आणि त्या मेंदूकडे आज जी प्रचंड आकलन आणि विवेचन शक्ति आहे ती आपण त्याला कशी देऊ शकलो१  १२१
  शब्दावली शेअर करणे सहभागी करणे ,ऑररिट१२१
  गतिचक्रावर१२१
  सहभागाने वापरतात १२१
   सहभागी १२१
   त्यातील विद्युत प्रवाह सिलिकॉन ते बोरॉन असा होतो. १२२
   रेडिओच्या माध्यमातून संदेशवहन करणे १२२
    ते करणारे उच्च कोचीचे इलेक्ट्रॉनिक्स मधले तंत्रज्ञ असतात.१२३
   ज्याचा काम करण्याचा १२३
   जास्त १२३
   वेग१२३
    संकल्पना ,उद्दिष्टव १२३

   या संबंधी सर्व भारतीयांनी विशेष चिंतन करण्याची गरज आहे१२३ 

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SANGANAK 5     
वाढवायचा आहे  ७३  भाग १७
      विषयावर असे ७३ भाग १७
      हजार बाराशे ७३ भाग १७
      एकाच ब्लॉगवरही पुष्कळ त-हेचे लेखन ठेवता येते. मी मात्र ७३ भाग १७
     व्यव्हाराऐवजी संगणकावर इलेक्ट्रॉनिक व्यव्हार करणे केव्हाही उपयोगी कारण त्यांत मजकुराची देवाण - घेवाण  वेगवान आणि दीर्घकाळ सुरक्षित राहू शकते. ७४ भाग १८
     अशी सुरक्षा  असेल तर कागदोपत्री ७४ भाग १८
     पुनर्प्रेषित करतांना दुसरा माणूस त्यात ७३ भाग १८
     असते असे नाही ७५ भाग १८
      बदलूही शकते ७५ भाग १८ 
      होऊ द्यायचे ७५ भाग १८
      असे पण ठेवताना७५ भाग १८
     लेबल लावला ७५ भाग १८
     जाऊन तो थोडा ७५ भाग १८
     जेणे करून फाइलची एक मूळ प्रत कार्यालयात सुरक्षित राहू शकते.  ७५ भाग १८
     संगणकाचा शोध ७६ भाग १९
      नव्या आणि ७६ भाग १९
      जे काही ७६ भाग १९
      रहावयाच्या ठिकाणी ७७ भाग १९
      अशा कित्येक ठिकाणी मानवाने काम करण्यावर मर्यादा पडतात. ७७ भाग १९
      दुय्यम दर्जाच्या आहेत. म्हणजे कुण्यातरी कंपनीने विकसीत केलेले७८ भाग १९
      संगणकावर इनस्क्रिप्ट पद्धतीने मराठी टंकन करणे ७८ भाग १९
       सारणी बद्ध ७९ भाग १९
      (उदा. एक्सेल किंवा स्प्रेडशीट) ७९ भाग १९
     संगणकीय काम आऊटसोर्स केले असेल तर त्यावर सुयोग्य इन्स्पेक्शन व मॉनिटरिंग  ७९ भाग १९    

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SANGANAK 6
  शब्दावली-
    चार्ट -सारणी , तक्ता
    कॉलम -रकाना
    ग्राफ- आलेख
     सॉर्टिंग- फेरमांडणी   ८० भाग २०
    मथकयाची८० भाग  २०
    पाहिल्याने ८० भाग २०
    यातील पहिला तक्ता धडा क्रमांक या मुद्यावर  आखलेला होता व त्यांत धड्याचे क्रमांक चढत्या क्रमाने लिहिले होते पण  दुसरा तक्ता धडयाचे शिर्षक या मुद्यावर लिहिला होता. ८१ भाग २०
   त्यांना गाव नमुना नंबर १ते २० असे म्हणतात. यापैकी ७वा व १२ वा तक्ता एकत्र असणारे पान सातबारा हा शब्द आपल्याला खुपच परिचयाचा आहे. ८२ भाग २०
   त्यांमुळे एकदाच एखाद्या अभ्यासू अधिका-याने केलेले तक्ते व गोषवारे त्याच पद्धतीने वर्षानुवर्षे वापरले जात. ८२ भाग २०
    अति अवघड ८३ भाग २०
    नोंदवहीच्या ८६ भाग२०
    पुढील ओळींमधे एकेका मुद्यावरील ८४ भाग २०
    सर्व खण भरून ८४ भाग २०
   ही मोजमाप सोपी जावी ८४ भाग २०
   अवाढव्य तक्ते लहानही करता येतात. ८४ भाग २०
   १६ ब चा टपाल क्रमांक ८९  भाग २०
   त्याचा पाठपुरावा जिल्हा स्तरावर एकत्रितपे करता येतो. ९० भाग २०
   तिस-या पानावर१, ५ , १३ ते १७ या रकान्यांची प्रिंट घेतली जाते. ९३ भाग २०
   स्टेशनवर रिझर्वेशन करण्यांस गेलो तर तिथला क्लार्क ही माहिती संगणकावरून सांगू शकतो. शक्य तिथे स्टेशन वर रेल्वे प्रशासनच मोठे मोठे इलेक्ट्रॉनिक तक्ते लावून ठेवते ज्यांत कोणत्या गाडीचे कोणते रिझर्वेशन  उपलब्ध आहे ते कळते. ९४ भाग२१
 मोठ्या जंक्शनचे ९४ भाग २१
  मागणी वाढली असेल तर एखादी जादा बोत्री जोडू शकतो. ९४ भाग २१
   ने देखील ही ९४ भाग २१
   दिली आहे ९४ भाग २१
    पाठवली जाईल ९४ भाग २१
         २०१० व २०११ मधे प्रायोगिक तत्वावर लागू करून तिची चाचणी घेण्यांत आली. ९६ भाग २२
      मोबाइलवरील स्पीकर फोनच्या सुविधेमुळे आता वेगळया मायक्रोफोन/ स्पीकरची गरजही उरलेली नाही. ९८ भाग २३
  गतीचक्र आणि त्या मेंदूकडे आज जी प्रचंड आकलन आणि विवेचन शक्ति आहे ती आपण त्याला कशी दोऊ शकलो? १२१  भाग २९
   शब्दावली -शेअर करणे =  सहभागी करणे , ऑरषिट =  १२१ भाग २९
   गतिचक्रावर १२१ भाग २९
   सहभागाने वापरतात भाग २९ पान १२१
    सहभागी भाग २९  पान नं१२१
    त्यातील विद्युत प्रवाह सिलीकॉन ते बोरॉन असा होतो. १२२ भाग २९
   रेडियोच्या माध्यमातून संदेशवहन करणे १२२ भाग २९
ते करणारे उच्च  कोटीचे इलेक्ट्रॉनिक्स मधले तंत्रज्ञ असतात.  १२३ भाग २९
  ज्याचा काम करण्याचा  १२३ भाग २९ 
  संकल्पना , उद्दिष्ट व १२३ भाग २९
   या संबंधी सर्व भारतियांनी विशेष चिंतन करण्याची गरज आहे. १२३ भाग २९
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    भाग १७
   संगणक म्हणजे आपल्या स्वतःच्या पुस्तकांचे  कपाट
    अर्थात आपला (blog)
   संकेतस्थळ बनवण एखाद्या संस्थेबद्दल माहिती देणे हा हेतु सर्वसाधारणपणे असतो. एखाद्या शाळेचे संकेतस्थळ असेल  तर ती कुठल्या शहरांत , कुठे आहे, किती मोठी आहे, प्रवेशप्रकिया कधी असते, परीक्षा कधी होणार , शिक्षक कोण कोण आहेत, कोणते फॉर्म भरायचे आहेत, शुल्क किती आहे इत्यादी सर्व माहिती असते जेणेकरून त्या माहीतीचा वापर लोकांनी करून घ्यावा. याच्या तुलनेत ब्लॉगचा सर्वसाधारण हेतू आपले लेख तिथे ठेवावे आणि लोकांनी ते वाचावे असा असतो. पूर्वी एखादा लेख लिहून झाला कि लेखकाची तळमळ असायची की, हा कुठेतरी छापला जावा. आता तो लेख ब्लॉगवर ठेवला की वाचला जातो. अर्थात अजूनही छापील स्वरूपात दैनिक , मासिक इत्यादी मध्ये येणारे लेख हजारो लाखो लोक वाचतात तर ब्लॉग वाचणारे त्या मानाने खुप कमी असतात. मात्र आपला लेख इतरांना  वाचण्यासाठी उपलब्ध आहे हे समाधान मिळतेच.  
          मग काही कल्पक व्यक्तींनी अजून नव्या नव्या योजना पुढे आणल्या टिव्वटर नावाच्या  कंपनीने शक्कल काढली की चला आमच्याकडे तुमचे खाते उघडा   आणि तुमचे मत दीडशे शब्दांत मांडान  ट्रीट म्हणजे पक्ष्यांचा चिवचिवाट. तर तस छोटसच कांही मांडा दिवसातून कितीदाही कांहीही मांडा. हा प्रकार खुप लोकप्रिय झाला. अमुक सिनेमा किती छान आहे. पासून आजची क्रिकेट मॅच कोण जिंकणार , अर्थसंकल्प कसा असेल किंवा तो किती चुकीचा होता, भारताने आण्विक करार करावा कां पासून अध्यात्मविद्या काय असते पर्यंत कोणत्याही विषयावर कांहीही भाष्य करावे अशी संधी सर्वांना आणि फुकट मिळाली. भारतात. सर्वांत  लोकप्रिय टिव्वटर आहेत अमिताभ बच्चन, नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल इत्यादी. त्यांचे टीव्ट लाखोंच्या संख्येने वाचले जातात. लौकरच टिव्वटर कंपनी श्रीमंत होऊन गेली कारण वरवर जरी तिथे लाखो लोकांची फुकट मत  फुकटात मांडलेली असतात असे दिसत असले तरी जाहिरात कंपन्यांना यातून मोठी माहिती  मिळते की लोकांचा कांय व कल आहे आणि कोणत्या प्रकारची जाहीरात केल्याने लोकांना आपल्या वस्तूंकडे वळवता येईल.
        मग अशीच एक कंपनी निघाली लिंक्ड इन (linked in)  ज्या मध्ये एकाच त-हेचा व्यापार करणारे ,  एकाच त-हेची  कौशल्य असणारे , एकाच त-हेचे राजकीय मत असणारे किंवा सामाजिक कार्य करणारे यांनी एकमेकांशी जोडले जाऊन सहकार्य करीत एकत्रपणे पुढे जावे. त्यानंतर अजून एका सोप्या कल्पनेवर आधारित  कंपनी निघाली फेसबुक- इथे कोणीही आपले खाते उघडावे , लहान -मोठे काहीही लिहावे ,त्यांच्या मित्रमंडळींना ते वाचता यावे व प्रतिक्रिया पण लिहिता  यावी अशीही सोय झाली. इथेही वरवर दिसते की कोट्यावधी लोकांना फुकट वापरायला एक प्लॉटफॉर्म दिला आहे- त्यातून कंपनीला कांय  मिळणार१ पण जनमानसाचे विश्लेषण व त्याचा जाहीरातीसाठी वापर हा एवढा कमालीचा व्यापार आहे की आज फेसबूक , लिंक्डइन किंवा टिव्वटर या संगणक क्षेत्रातील दिग्गज कंपन्या झाल्या आहेत. लोकही त्यांच्याकडे मनोरंजणासाठी वळतातच.
        आता सर्वात  नवी शक्कल निघाली आहे ती ऑप्स च्या रूपात व्हाट्स ऑप ही संकल्पना व त्यांची कंपनी तुफान लोकप्रिय झाली कारण त्यांनी पुरवलेल्या सुविधेतून लोकांना आपापले छोटे-छोटे गट निर्माण करण्याची व त्या माध्यमातून चटकन संवाद साधण्याची संधी मिळाली.
            याशिवाय विकीपीडीया ही अगदी वेगळी संकल्पना पुढे आली . तिथे त्यांनी ज्ञानाचा व माहितीचा भला मोठा खजिनाच निर्माण केला. आज त्यांच्या संकेतस्थळावर जाऊन आपण जगातील  अनंत विषयांवरचे अनंत लेखन वाचू शकतो.
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SANGANAK 18
मराठीसाठी टाइपरायटर बनबणा-या कंपन्यांनी सुद्धा हेच तत्व  विचारत घेऊन त्यावरील की -बोर्डाचा अनुक्रम उलट -सुलट ठेवला . त्यामुळे त्याच्या सवयीसाठी किमान ६ महिन्यांचा टायपिंग कोर्स पूर्ण करावा लागतो.

  इथे निवडक मराठी fonts चे फोटो
 मराठी
 या सॉफ्टवेअर कंपन्यांनी
तयार करुन घेतले
मराठी टाइपरायटरचा अनुक्रम वापरायचा आहे की झनास्क्रिप्ट की फोनेटिक.


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MOST PROBABLY THIS IS TAKEN
SANGANAK  
५६  चीनी लोकांनी इंग्रजी साक्षरतेच्या मागे न लागता आधी चीनी भाषेतून संगणक साक्षरता वाढवली .मग आता

आपण त्यांच्यापेक्षा मागे रहातो असा गळा काढण्यांत कांय अर्थ?
ही दृष्टि येत नाही तोपर्यत भारतीय भाष्यांचे दुर्दैव कायम रहाणार . भारतात संगणक हा फक्त उच्चशिक्षितांनी व इंग्रजी भाषेतूनच वापरण्यासाठी आहे अशी भ्रामक समजूत पसरली . त्यामुळे सामान्य जनतेने या तंत्रज्ञानाकडे दुर्लक्ष केले. भारतीय भाषासाठी संगणकाचे सॉफ्टवेअर तयार करणा-या कंपन्यांना स्वतःचा माल खपावा यासाठी स्टॅण्डर्ड नको होत . सीडॅक मधील वैज्ञानिकांनी
१६तारांची BUS गृहीत धरुन जे स्टॅण्डर्ड तयार केले ते BIS व युनीकोड  कन्सॉर्शियलने मान्य करूनही  त्यांच्याकडे पडून राहिले कारण खुद्द सीडॅकनेच त्याचा पाठपुरावा करायचे सोडून स्वतःचे वेगळे गुप्त कोडिंग असलेले सॉफ्टवेअर बाजारात उतरवले . सरकारातील व्यवहार इंग्रजीत असल्याने तिथले अधिकारीही इकडे लक्ष देईनात . त्यामुळे एकीकडे भाषिक सॉफ्टवेअर विकणा-या कोणत्याही कंपनीला  स्टॅण्डडीयझेशन नको होते.
दुसरीकडे ज्या मायक्रोसॉफ्ट कंपनीच्या हाती संपूर्ण भारतीय बाजार स्वारस्य नव्हते  तिलाही यात ५६
दुसरीकडे भारत सरकारला भाषिक  स्टॅडर्डायझेशनची फिकिर किंवा दृष्टी नव्हती .तिसरीकडे५६

१९९५-९६मधे लीनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम ही मायक्रोसॉफ्टला टक्कर देणारी नवी सिस्टम आल्यावर चित्र थोडेसे पालटले आता......५६
तरीही जोपर्यत भारत सरकारला ५६
आणि दूरदृष्टि राष्ट्रधर्म अजिवात न जाणणारा५६
स्वतःठरवून युनिकोडला तेच स्वीकारायला लावले ५६
ठेवत रिकवून ठेवले आहेत५६
यासाठी योग्य तो जागतिक दबाव आणला५६
वेगवेगळ्या भाषा बोलणा-या तमाम मुस्लिम देशांनी५६


Wednesday, November 23, 2016

tYPED BY ASHU

पिवळी हायलाइट = दुरुस्ती झाली
भाग ९ -- 
चिप -?चकती ,पट्टी , फीत-??३८
रिलोड -पुनस्थापना ३८
अपलोड- जालस्थापना३८
 डाऊनलोड-स्थलस्थापना (भूस्थापन) ३८
  संगणक आपल्याला विचारतो की या फाइली कुठे ठेऊ
?३८
असा एक कप्पा३९
सामान्यपणे तिथेच साठवतो.३९
त्याचा संग्राहक बराच मोठा घ्यावा लागतो.४०
कामांची एक यादी उघडते४०
भाग १० -- 
इंटरनेट -महाजाल४१
इलेक्ट्रिक संदेशांना (पर्यायाने ध्वनि संदेशांना देखील)४१
झोन असेल तर तिथल्या तिथे बोलले जाते व SMS वर संदेश वाचता येतो.४३
रेडियो तरंग आणि सॅटेलाइट वरुन काही प्रवास तारांमधून होतो.४३
भाग ११ -- 
आपण त्यावर वैयक्तिक असे वर्णन केले असेल तर तो इतरांना वाचता येत नाही.४४
आपल्या ढगाची पब्लिक किंवा सार्वजनिक असे आपण म्हटले असेल तर ४४
भाग १२ -- 
त्यांना एक वर्तुळकारांत मांडायच आणि ९ नंतर४६
पैकी फक्त एक एवढाच माहित आहे४७
दशांश पद्धतीचे४७
आणि खरोखरच द्विअंश पद्धतीत २०ही संख्या १०१०००अशी लिहिली जाते ४८

चे ढीग तयार करता येतील४८
प्रत्येक तारेला वेगवेगळा वीजपुरवठा केला जातो. या चित्रातील पेटलेल्या बल्प वरून आपण हा आकडा लिहू-०१००१०१० याचा गणिती अर्थ ७४ असा होईल पण अक्षर म्हणून समजायचे असेल तर J हे अक्षर असेल५०
त्यांना  कोटयावधी सिग्नल वेगळेपणाने ओळखू येतात५०
मानवी भाषेत बदलू शकतो ५०
इंग्रजीत जास्त वापराव्या लागणा-या अक्षरांना ५१
कुठल्याही दशांश आकड्याला झटकन द्विअंश आकडयांत बदलण्याची एक लघू -गुरू पद्धत वेदिक गणितात दिलेली आहे.तर ५२
आता या सर्व भाषांमधे वैयक्तिक वापराप्रमाणेच प्रकाशन क्षेत्रातही झपाटयाने काम होऊ लागले आहे ५५
२५६ मधे बसवता आली५४
सोळा तारांची बस वापरात येण्याआधी५५
प्रयोग केला गेला ५५
 व पाच सात सुंदरसे५५
२००६मायक्रोसॉफ्टच्या विण्डोज ७ या ५५
ही प्रत्येक भारतीय भाषेसाठी युनीकोड स्टॅण्डर्डचा एक-एक फॉण्ट उपलब्ध झाला आहे५५
 या तुलनेत भारतीय भाषा मात्र दुर्दैवी ठरल्या५६
त्यांचा कॉपीराइट ठेवला नाही ५८
संगणक विकासात अगदी सुरवातीला ५९
तसे होऊ नये एकेक कामाचा प्रोग्रॅम लिहायला काही दिवस लागत  असत ५९
 पण ज्यांना तयार हत्यारांमधून तेवढे नेमकेच काम करायचे असेल त्यांना विण्डोज सोईची आहे. ५९
यातील प्रत्यक्ष वापरणा-याने करायच्या कामाखेरीज इतर सर्व टप्पे एकत्रपणे Stanslandisc करून os व वरून५९
सर्वाधिक श्रीमंत म्हणुन ६०
इत्यादी सर्व ६०
टेलीफोन तारांमार्फत मोठया प्रमाणात व जगभरात सुठ करण्यांत आले६०

तिच्या मार्फत काम करायचे तर थोडे प्रोग्रॅमिंग यायला हवे मग सरकारी लोक बिचकतात ते म्हणतात आम्हाला सांगू नका आम्ही कोणी तज्ञ्ज्ञ नाही आणा कुणीतरी तज्ञ्ज्ञ आणि त्याच्याकडून काम करून घ्या  नाहीतर पडू दे ते संगणक तसेच बिनकामाचे६२
हे सर्व भाग आपल्याला समोर दिसतात६२
तिच्या अधिक क्षमतेचा फायदा घेत६५


मराठीसाठी टाइपरायटर बनबणा-या कंपन्यांनी सुद्धा हेच तत्व  विचारत घेऊन त्यावरील की -बोर्डाचा अनुक्रम उलट -सुलट ठेवला . त्यामुळे त्याच्या सवयीसाठी किमान ६ महिन्यांचा टायपिंग कोर्स पूर्ण करावा लागतो.

  इथे निवडक मराठी touts चे फोटो
 मराठी
 या सॉफ्टवेअर कंपन्यांनी
तयार करुन घेतले
मराठी टाइपरायटरचा अनुक्रम वापरायचा आहे की झनास्क्रिप्ट की फोनेटिक.