Wednesday, January 4, 2012

ch 4 संगणक है स्लेट पेन्सिल 1-4

(राजकमल)
भाग - ४
संगणक है स्लेट पेन्सिल

स्लेट पेन्सिल को कौन नही जानता?
इसका सबसे अच्छा गुण यह है कि स्लेट पर पेन्सिल से कुछ भी लिखे - पर जैसेही उसे मिटा डाला, स्लेट फिर कोरी हो जाती है - नई लिखाई के लिये तैयार। फिर इस पर नया गणित करो या नया चित्र बनाओ।

संगणक भी कोरी स्लेटकी तरह होता है। और मजा ये कि इस स्लेटकी लंबाई और चौडाई खींचकर बढाई – घटाई जा सकती है। इसी लिये इस पर बडेबडे लेख, बडे चित्र या बडी सारणियाँ भी बनाई जा सकती हैं। जो भी लिखा हैं उसके बीच में कहीं गलती दिखे तो उतनी छोटीसी गलतीको मिटाकर वहाँ सही लिख दो।
और यदि सारा ही गलत लिखा गया हो तो भी कोई बात नही, सारा पोंछ कर दुबारा लिखा जा सकता है।

स्लेट पेन्सिल पर लिखने के लिये तीन चीजें चाहिये - एक स्लेट, दूसरी पेन्सिल, और तीसरा हमारा दिमाग - जो बतायेगा कि क्या लिखना है। संगणक की स्लेट पर लिखने के लिये इन तीन के साथ साथ संगणक का मस्तिष्क भी उपयोग में लाना पडता है।

संगणक का मस्तिष्क है उसकी प्रोसेसर चिप। इसे व अन्य कई उपकरणोंको एक बडे मदर- बोर्ड पर जोडकर उसे एक डिब्बे के अंदर बंद कर देते हैं (धूल धक्कड से बचने के लिये)। इसे सीपीयू या सेंट्रल प्रोसेसिंग युनिट कहते हैं। हम इसे कार्यकरी बक्सा कह सकते हैं। संगणकसे संबंधित नब्बे प्रतिशत काम इसी कार्यकारी बक्सेमें लगी प्रोसेसर चिप व अन्य उपकरणोंकी सहायता से होते हैं। इन सभी उपकरणोंको एकत्रित रूपमें हम जड-वस्तू-प्रणाली कह सकते हैं या यंत्र- प्रणाली क्योंकि इससे बोध होता है कि संगणक में मंत्र और तंत्र की भी प्रणालियाँ होती होंगी, जो कि वस्तुतः हैं।

संगणक के सभी सॉफ्टवेअरोंको हम तंत्र-प्रणाली कह सकते है और उसके आधार पर काम करने की पध्दती को मंत्र- प्रणाली। इस प्रकार संगणक में यंत्र-तंत्र-मंत्र तीनों हैं, जबकि बाकी यंत्रोमें केवल यंत्र होता है।

लेकिन अभी मंत्र व तंत्रकी बात छोडकर केवल यंत्रकी बात करते हैं। ताकि स्लेट पेन्सिल की बात समझमें आये।जब हम हम नया संगणक लाते हैं तो हमारे सामने चार बातें होती हैं-- कार्यकारी बक्सा, मॉनीटर या स्क्रीन, की-बोर्ड और माऊस।

संगणक की प्रोसेसर चिप उसका मस्तिष्क है , संगणक का मॉनीटर या स्क्रीन हमारी स्लेट है , और की-बोर्ड या माऊस दोनों ही बनती हैं पेन्सिल। अब जब भी संगणक पर काम करना हो तो याद रखना कि यह तो केवल एक स्लेट है जिसपर कुछ भी लिख सकते हैं- यदि लगे कि गलत लिखा तो उसे तो उसे मिटा दो , और यदि लगे सही लिखा है तो बचा कर रख लो।

तो आओ, सबसे पहले संगणकका कार्यकारी बक्सा, पडदा (स्क्रीन या मॉनिटर), कुञ्जीपाटी (की बोर्ड) और माउसके कामको समझते हैं।

कार्यकारी बक्सा और पडदा (स्क्रीन ) दोनों ही बिजलीसे चलते हैं, सो पहले दोनोंके लिये बिजलीका बटन दबाओ। ये दोनों आपसमें भी तारसे जोडने पडते हैं। अब संगणकके मस्तिष्क अर्थात् प्रोसेसर चिप व अन्य अंदरूनी भागोंको आरंभ करनेके लिये एक ओर बटन लगा होता है, उसे भी चालू करो। अब करीब एक मिनटमें संगणक अपनी अंदरूनी चिपोंको तैयार कर तुम्हारे आदेश की प्रतीक्षा करने लगता है। उतना समय उसे देना पडता है।

यदि तुम्हारे पास लॅपटॉप है तो उसमें कार्यकारी बक्सा, पडदा व कुञ्जीपटल सब अन्दरसे आपसमें जुडे रहते हैं, तो एक ही बटनसे सारे चालू हो जाते हैं।

कार्यकारी बक्सेमे ही तारसे कुञ्जीपाटी और माउस (हमारे घरमें प्यारसे उसे मूषक ही कहते हैं) जुडे होते हैं। हम जो भी सूचना संगणकको देना चाहते हैं, वह इन्हीं के माध्यमसे देते हैं। जब हम टेबुलपर मूषक को दायें-बायें सरकाते हैं तो पडदेपर भी एक बाण या कर्सर (सूचक) उसी प्रकारसे सरकता है। जो काम करना है, जहाँसे करना है, वहाँ बाणको ले आओ और संगणकको सूचना देनेमें लग जाओ।

तुमने क्या सूचना दी और संगणकने क्या समझा यह हम पडदेपर देख सकते हैं। इसीसे मैं इसे स्लेट कहती हूँ क्योंकि पडद्पर दिखा कि गलत लिखा गया है तो उसे मिटाकर दुबारा लिख सकते हैं।

लेकिन याद रहे कि संगणकको आरंभ करनेपर हमें यह पडदा कोरा नही दिखता बल्कि उसपर कई चित्राकृतियाँ बनीं होती हैं। क्योंकि संगणक केवल स्लेट नही, और भी बहुत कुछ है, तो उसके कुछ कामोंकी सूची भी पडदेपर लिखी होती है। इन चित्राकृतियोंको संगणककी भाषामें आयकॉन कहते हैं। तुम्हे जो काम करना हो उसकी चित्राकृति पर मूषक के सहारे बाणको ले आओ औऱ वह काम शुरू करो।

एक बात और। बिलकुल पहले दिन मूषक को चलाना सीखना पडता है। टेबुलपर उसकी छोटीसी हरकतसे भी बाण कहींसे कहीं भागता है, कभी तो पडदेसे बाहर भी हो जाता है। पर धैर्यसे सीखो कि कैसे बाणको ऊपर-नीचे, व दायें-बायें सरकाते हैं। अब तुम्हें मजा आने लगेगी।

अब देखते हैं कि मूषककी रचना कैसी है। इसकी निचली सतहके हिलनेसे बाण हिलता है। इसके अलावा मूषक की पीठपर एक चक्री होती है जो तर्जनी उँगलीसे ऊपर नीचे घुमाई जा सकती है। उसके दोनों ओर दो बडे बटन होते हैं। बाँया बटन टिकटिकाने या क्लिक करनेसे कोई काम आरंभ होता है, परन्तु दाँया बटन क्लिक करनेसे उस कामसे संबंधित अन्य काम किये जा सकते हैं। यथा उसकी प्रतियाँ बनाना, उसका नाम बदलना, किसीको भेजना इत्यादि। किसी कामका पन्ना खुला हो तो चक्री घुमाकर उसे तेजीसे ऊपर-नीचे सरकाया जा सकता है।

पडदेको डेस्कटॉप भी कहते हैं। कहाँसे आया यह शब्द ? अपने कामका डेस्क याद करो। उसपर काम करनेकी कई फाइलें रखी होती लेकिन हैं। किसी फाइलपर काम आरंभ करनेसे पहले हम कामसे संबंधित कुछ बातें जुटाकर रख लेते हैं -- जैसे पेन, पेन्सिल, रबर, शब्दकोष, कंपास, पानीका गिलास (जिसकी जैसी जरूरत हो)। इसी प्रकार संगणकके डेस्कटॉपपर भी बार बार किये जानेवाले कामोंकी चित्राकृतियाँ रखी जाती हैं, जिनपर टिकटिकानेसे उस कामके लिये एक पन्ना खुलता है और हम काम आरंभ कर सकते हैं।

संगणकके सभी सॉफ्टवेअर, प्रोग्राम या फाइलें हम डेस्कटॉपपर नही रखते । केवल उन्हींको रखते हैं जिनका काम हमें बार बार करना होता है। फाइलोंको बीचबीचमें डेस्कटॉपसे हटाकर संगणकमें ही दूसरी योग्य जगहपर रखते रहना एक अच्छी आदत है



संगणकहै स्लेट पेन्सिल - Ch. 4

स्लेट पेन्सिल को कौन नही जानता?
इसका सबसे अच्छा गुण यह है कि स्लेट पर पेन्सिल से कुछ भी लिखे - पर जैसेही उसे मिटा डाला, स्लेट फिर कोरी हो जाती है - नई लिखाई के लिये तैयार। फिर इस पर नया गणित करो या नया चित्र बनाओ।

     संगणक भी कोरी स्लेटकी तरह   होता है। उसका फायदा यह है कि इस  स्लेटकी लंबाई और चौडाई खींचकर बढाई – घटाई जा सकती है। इसी लिये इस पर बडेबडे लेख, बडे चित्र या बडी सारणियाँ भी बनाई जा सकती हैं। जो भी लिखा हैं, तो उसके बीच में कहीं गलती दिखे तो उतनी छोटीसी गलतीको मिटाकर वहाँ सही लिख दो।
और यदि सारा ही गलत लिखा गया  हो तो भी कोई  बात नही, सारा पोंछ कर दुबारा लिखा जा सकता है।

   स्लेट पेन्सिल पर लिखने के लिये तीन चीजें चाहिये - एक स्लेट, दूसरी पेन्सिल, और तीसरा हमारा दिमाग- जो बतायेगा कि क्या लिखना है। संगणक की स्लेट पर लिखने के लिये इन तीन के साथ साथ संगणक का मस्तिष्क भी उपयोग में लाना पडता है।

    संगणक का मस्तिष्क है उसकी प्रोसेसर चिप। इसे व अन्य कई उपकरणोंको एक बडे मदर- बोर्ड पर जोडकर उसे एक डिब्बे के अंदर बंद कर देते हैं (धूल धक्कड से बचने के लिये)। इसे सीपीयू या  सेंट्रल  प्रोसेसिंग युनिट कहते हैं। हम इसे कार्यकरी बक्सा कह सकते हैं। संगणकसे संबंधित नब्बे प्रतिशत काम इसी कार्यकारी बक्सेमें लगी चिप व अन्य उपकरणोंकी सहायता से होते हैं। इन सभी उपकरणोंको  एकत्रित रूपमें हम जड-वस्तू-प्रणाली कह सकते हैं । लेकिन मैं इसे यंत्र- प्रणाली कहना पसंत करती हूँ  क्योंकि इससे बोध होता है कि संगणक में मंत्र और तंत्र की भी प्रणालियाँ  होती होंगी, जो कि वस्तुतः हैं।

संगणक के सभी सॉफ्टवेअरोंको हम मंत्र-प्रणाली कह सकते है और उसके आधार पर काम  करने की पध्दती को तंत्र- प्रणाली। इस प्रकार संगणक में यंत्र-तंत्र-मंत्र तीनों  हैं, जबकि बाकी यंत्रोमें केवल यंत्र और कभी कभी तंत्र होता है।

लेकिन अभी मंत्र व तंत्रकी बात छोडकर केवल यंत्रकी बात करते हैं। ताकि स्लेट पेन्सिल की बात समझमें आये। हम नया संगणक लाते हैं तो सामने चार बातें ही होती हैं-- कार्यकारी बक्सा,  मॉनीटर या स्क्रीन,  की-बोर्ड और माऊस।

संगणक का कार्यकारी बक्सा और खास कर प्रोसेसर चिप उसका मास्तिष्क है , संगणक का मॉनीटर या स्क्रीन हमारी स्लेट है , और की-बोर्ड या माऊस  दोनों ही बनती हैं पेन्सिल। अब जब भी संगणक पर काम करना हो तो याद रखना कि यह तो केवल एक स्लेट है जिसपर कुछ भी लिख सकते हैं- यदि लगे कि गलत लिखा तो उसे तो उसे मिटा दो , और यदि लगे सही लिखा है तो बचा कर रख लो।

तो आओ, पहले जानते हैं संगणकका कार्यकारी बक्सा, पडदा (स्क्रीन या मॉनिटर), कुञ्जीपाटी (की बोर्ड) और माउसके विषयमें। इनका काम पहले समझते हैं--

कार्यकारी बक्सा और पडदा (स्क्रीन ) दोनों ही बिजलीसे चलते हैं, सो पहले दोनोंके लिये बिजलीका बटन दबाओ। ये दोनों आपसमें भी तारसे जोडने पडते हैं। अब संगणकका मस्तिष्क अर्थात् प्रोसेसर चिप व अन्य अंदरूनी भागोंको आरंभ करनेके लिये एक ओर बटन लगा होता है, उसे भी चालू करो। अब करीब एक मिनटमें संगणक अपनी अंदरूनी चिपोंको तैयार  कर तुम्हारे आदेश की प्रतीक्षा करने लगता है। उतना समय उसे देना पडता है।

कार्यकारी बक्सेमे ही तारसे कुञ्जीपाटी  और माउस(हमारे घरमें प्यारसे उसे मूषक ही कहते हैं) जुडे होते हैं। हम जो भी सूचना संगणकको देना चाहते हैं, वह इन्हीं के माध्यमसे देते हैं। जब हम टेबुलपर मूषक को दायें-बायें सरकाते हैं तो पडदेपर भी एक बाण या कर्सर (सूचक) उसी प्रकारसे सरकता है। जो काम करना है, जहाँसे करना है, वहाँ तीरको ले आओ और संगणकको सूचना देनेमें लग जाओ।

तुमने क्या सूचना दी और संगणकने क्या समझा यह हम पडदेपर देख सकते हैं। इसीसे मैं इसे स्लेट कहती हूँ क्योंकि इसपर जो भी लिखा गया वह गलत हो तो मिटाकर दुबारा लिख सकते हैं।

लेकिन याद रहे कि संगणकको आरंभ करनेपर हमें यह पडदा कोरा नही दिखता बल्कि उसपर कई चित्राकृतियाँ बनीं होती हैं। क्योंकि संगणक केवल स्लेट नही, और भी बहुत कुछ है, तो उसके कुछ कामोंकी सूची भी पडदेपर लिखी होती है। इन चित्राकृतियोंको संगणककी भाषामें आयकॉन कहते हैं। तुम्हे जो काम करना हो उसकी चित्राकृति पर मूषक के सहारे बाणको ले आओ औऱ काम शुरू।

एक बात और। बिलकुल पहले दिन मूषक को चलाना सीखना पडता है। टेबुलपर उसकी छोटीसी हरकतसे भी बाण कहींसे कहीं भागता है, कभी तो पडदेसे बाहर भी हो जाता है। पर धैर्यसे सीखो कि कैसे बाणको ऊपर-नीचे, व दायें-बायें सरकाते हैं। अब तुम्हें मजा आने लगेगी। अब देखो कि  मूषककी रचना कैसी है।

मूषककी नीचली सतहके हिलनेसे बाण हिलता है। इसके अलावा मूषक की पीठपर एक चक्री  होती है जो ऊपर नीचे की जा सकती है। उसके दोनों ओर दो बडे बटन होते हैं। बाँया बटन टिकटिकाने या क्लिक करनेसे कोई काम आरंभ होता है, परन्तु दाँया बटन क्लिक करनेसे उस कामसे संबंधित अन्य काम किये जा सकते हैं। यथा उसकी प्रती बनाना, उसका नाम बदलना, किसीको भेजना इत्यादि। किसी कामका पन्ना खुला हो तो चक्री घुमाकर उसे तेजीसे ऊपर-नीचे सरकाया जा सकता है।

पडदा (स्क्रीन ) डेस्कटॉप भी कहलाता है। कहाँसे आया यह शब्द ? अपने कामका डेस्क याद करो। किसी फाइलपर काम आरंभ करनेसे पहले हम कामसे संबंधित कुछ बातें जुटाकर रख लेते हैं -- जैसे पेन, पेन्सिल, रबर, शब्दकोष, कंपास, पानीका गिलास (जिसकी जैसी जरूरत हो)। इसी प्रकार संगणकके डेस्कटॉपपर भी बार बार किये जानेवाले कामोंके कृतिचित्र रखे जाते हैं, जिनपर टिकटिकानेसे उस कामके लिये एक पन्ना खुलता है और हम काम आरंभ कर सकते हैं।

संगणकके सभी सॉफ्टवेअर, प्रोग्राम या फाइलें हम डेस्कटॉपपर नही रखते । केवल उन्हींको रखते हैं जिनका काम हमें बार बार करना होता है। फाइलोंको बीचबीचमें डेस्कटॉपसे उठाकर योग्य जगहपर रखते रहना एक अच्छी आदत है।
-------------------------------------------------------------------------
































ch3 संगणक है युक्तिभरा जादूगर 1-3




संगणक है युक्तिभरा  जादूगर

संगणक है युक्तियों भरा जादूगर यंत्र । लेकिन कई बार लोगोंको इससे इतना डर लगता है जैसे अंधेरे कमरे के भूत से। भूत का डर क्यों लगता है? इसकी एक वजह है अंधेरा और दूसरा हमारा मन जो भूत जैसी शंकाओंमें विश्वास कर लेता हैं।
    पर इस डर को भगाने का उपाय कितना सरल है- कमरे में रोशनी कर दो। या किसीका दोस्तका हाथ पकड कर कमरे में जाओ। बस खतम हो गया भूत।
    संगणक से भी लोग क्यो डरते है? उन्हें लगता है , कि वे कोई गलत बटन दबा देंगे और बडा अनर्थ हो जायेगा।
    संगणक से भी लोग क्यो डरते है? उन्हें लगता है , कि वे कोई गलत बटन दबा देंगे और बडा अनर्थ हो जायेगा।

तो सबसे पहले हमे समझ लेना चाहिये कि संगणक का कोई बटन दब गया और उसमें कोई गडबडी हुई ऐसा साधारणतया कम ही होता है।  प्रायः नही हे बराबर!

    डरने का दूसरा कारण यह है कि संगणक का हर काम एक खास तरीके से या खास क्रम से होता है। जहाँ हमसे उस क्रम में जरा सी भी चूक हुई कि संगणक अडियल टट्टूकी   तरह अड जाता है। फिर वह आगे चलेगा ही नही। आपको अगला क्रम पता न हो तो आप दो- चार बार प्रयास करेंगे, फिर कहेंगे मारो गोली, यह नही चल रहा है। फिर इसे सीखने का उत्साह समाप्त हो जाता है और फिर हम उससे कतराने लगते हैं।

तो हमें केवल इतना जानना है कि जो काम हम संगणकसे करवाना चाहते हैं, उस काम का क्रम कैसा रहेगा। वास्तव में यह इतना  सरल है कि पाच- छह बार करने पर इसकी समझ भी आ जाती है और आदत भी पड जाती है। जिस तरह जादूगर बडे आराम से और युक्तिसे हर एक को अपना जादू दिखाता है, उसी तरह संगणक  की युक्तियाँ हमारे भी समझने में आ जाती है।

   तो सीखनी है केवल कई छोटी छोटी युक्तियाँ । और  हां, यदि कोई दोस्त थोडी देर साथ आये, रहे, और ये युक्तियाँ सिखा दे तो यह और भी सरल बात हो जाती है। लेकिन तब हमारा भी कर्तव्य बन जाता हैकि हम भी किसी और को ऐसे ही हाथ पकड कर संगणक सिखायें।












































ch 9 संगणक है अलमारी -DTP done


राजकमल
भाग ९
संगणक  है अलमारी

अपने घर की अलमारी याद करो। इसमें कई खाने बने होते हैं और हम अपनी सुविधाके अनुसार वर्गीकरण करके उन खानोंमें  उस उस तरह की चीजे रखते हैं। कभी किसी खानेमें ताला लगानेकी सुविधा हो तो हम अपनी कीमती वस्तुएँ  उस खानेमें रखते हैं। कभी कभी हम कुछ वस्तुओं की गठरी  बाँधकर रखते हैं और ऐसी कई गठरियाँ अलमारी में रख सकते हैं। संगणक के साथ कुछ ऐसा ही करते हैं।
पहले हम संगणकके प्रोग्राम, फाइलें (धारिका) और फोल्डर ( संचिका या गठरी) को समझेंगे। हरेक प्रोग्राम एक तंत्र होता है जो कोई तज्ज्ञ विकसित करता है। खास खास कामके लिये खास प्रोग्राम होता है पर कई स्टॅण्डर्ड  प्रोग्राम भी होते हैं। प्रोग्रामके सहारे हम जब भी काम करेंगे तब उसकी एक धारिका बनेगी। ऐसी धारिकाओंको एकत्रित रखनेके लिये उन्हें संचिकामें (फोल्डरमें) रखते हैं।

सामान्यतया हम संगणकके कार्यकारी बक्से CPU को खोलकर नही देखते। हार्डवेअरकी पढाई करनेवाले देखते हैं। वैसे हम भी सरलता से देख सकते हैं क्यों कि  बक्से का बाजूका फ्लॅप या ढक्कन एक स्क्रू ड्राइवर से खोला जा सकता है।

इस CPU के अंदर अलग- अलग काम करने वाले उपकरण लगे होते हैं जैसे कई प्रकारके चिप, पीसीबी सर्क्टिस इत्यादि। इसमें सर्वप्रमुख है संगणक का मस्तिष्क अर्थात प्रोसेसर चिप। इसे भी अपने कामको संभालनेके लिये एक स्लेट चाहिये, जो रॅम डिस्क है और हमारे किये काम की फाईलें संभाल कर, संग्रहित कर रखनेके लिये हार्ड डिस्क होती है। प्रोसेसर और हार्ड डिस्कके लिये अच्छे हिंदी शब्द हैं -- विवेचक और संग्राहक।
संगणक खरीदते समय ही तय करना पडता है कि हमारी संगणकरूपी अलमारी अर्थात् संग्राहक डिस्क (हार्ड डिस्क) कितनी बडी होगी। जब हम उसे घर लाकर पहली बार सेटिंग करते हैं तभी संग्राहक डिस्कके दो या तीन भाग बना लेना चाहिये।
इन भागोंको    C, D  और E  ड्राइव नाम देने का प्रचलन हैं। C ड्राइवमें सभी सॉफ्टवेअर प्रोग्राम  रखे जाते हैं। कभी कभी वे खराब हो जाते हैं तब  C  ड्राइवसे सारी फाइलें हटाकर दुबारा सभी प्रोग्राम लोड करने पडते हैं। इन प्रोग्रामों की सीडी भी मिल जाती है और उन्हें दुबारा लोड करने में कोई दिक्कत भी नही है। लेकिन इन प्रोग्रामों पर काम करके जो फाइलें हम बनाते हैं, उन्हें C  के बजाय  D  या E   ड्राइवमें रखना चाहिये ताकि जब हमें C  ड्राइवकी सफाई करनी हो, तब फाइलें सुरक्षित रहें। माय डॉक्यूमेंट और डेक्सटॉप, दोनों ही C  ड्राइव्हका हिस्सा हैं और बार बार काम करना हो तो सुविधाके लिये कई फाइलें सामान्यतया इन्ही में रखी जाती हैं। इसीलिये बीच बीच में फाइलों को वहाँ से निकालकर  D  ड्राइवमें नई संचिकाएँ अर्थात् गठरी बनाकर उनमें रखना जरूरी है।

एक ही तरह की फाइलों को एक गठरीमें रखनेमें सुविधा है। इसके लिये हम संगणक पर कोई नई संचिका (न्यू फोल्डर) बना कर और उसे अच्छासा नाम देकर उसी विषयसे संबंधित धारिकाएँ (फाइलें) उसमें रख देते हैं। फिर यदि एक गठरी या संचिका (फोल्डर) को उठाकर दूसरे ड्राइव में  या दूसरी संचिकामें रखते हैं तो उसकी सभी फाइलें अपने आप उधर चली जाती हैं। वरना उन्हें एक एक करके उठाकर रखना पडता।

इंटरनेट से हम फाइलें तो भेज सकते हैं लेकिन गठरी (फोल्डर) नही। इसलिये यदि हम फोल्डर को झिप (zip) करें तो वह गठरी भी एक झिप-फाइल बन जाती है, फिर उसे इंटरनेट पर भेजा जा सकता है। दूसरे सिरे पर उस फाइल को डाऊनलोड करके अनझिप करने पर गठरी और उसमें बाँधकर रखी धारिकाएँ वहाँ उपलब्ध हो जाती हैं।

अलमारी की ही तरह संगणक में भी ताला लगाने की व्यवस्था है। ताला किसी भी फाइलमें, या फोल्डरमें, या ड्राइवमें या फिर पूरे संगणकपर भी लगाया जा सकता है। ताला खोलनेकी चाबीको गुप्तशब्द कहा जाता है।

हर फाइल के लिये अलग अलग गुप्तशब्द हो सकता है, या फिर पूरे फोल्डर के लिये, या पूरे ड्राइव के लिये और फिर भी चाहें तो  पूरे संगणक को खोलने के लिये भी गुप्तशब्द का उपयोग किया जा सकता है। ऐसा होने पर केवल वही व्यक्ति इन्हें खोलकर पढ सकेंगे जिन्हें गुप्तशब्द पता हो।

सामान्यतया हमें संगणक के प्रयोग में इतनी गुप्तता की आवश्यकता नही होती। लेकिन बँक, सुरक्षा से संबंधित फाइलें, कंपनियों के व्यवहार इत्यादि में गुप्तता की आवश्यकता होती है। ऐसे समय यह सुविधा काम आती है।
-----------------------------------------------------------------


Chp- 9

संगणक  है अलमारी

अपने घर की अलमारी याद करो। इसमें कई खाने बने होते हैं और हम अपनी सुविधाके अनुसार वर्णीकरण करके उन खानोंमें  उस तरह की चीजे रखते हैं। कभी किसी खानेमें ताला लगानेकी सुविधा हो तो हम अपनी कीमती वस्तुएँ  उस खानेमें रखते हैं। कभी कभी हम कुछ वस्तुओं की गठरी  बाँधकर रखते हैं और ऐसी कई गठरियाँ अलमारी में रख सकते हैं। संगणक के साथ कुछ ऐसा ही करते हैं।
पहले हम संगणकके प्रोग्राम, फाइलें (धारिका) और फोल्डर ( संचिका या गठरी) को समझेंगे। हरेक प्रोग्राम एक तंत्र होता है जो कोई तज्ज्ञ विकसित करता है। खास खास कामके लिये खास प्रोग्राम होता है पर कई स्टॅण्डर्ड  प्रोग्राम भी होते हैं। इनके सहारे हम जब भी काम करेंगे तब उसकी एक धारिका बनेगी। ऐसी धारिकाओंको एकत्र रखनेके लिये उन्हें संचिकामें रखते हैं।

सामान्यतया हम संगणकके कार्यकारी बक्से CPU को खोलकर नही देखते। हार्डवेअरकी पढाई करनेवाले देखते हैं। वैसे हम भी सरलता से देख सकते हैं क्यों कि  बक्से का बाजूका फ्लॅप या ढक्कन एक स्क्रू ड्राइवर से खोला जा सकता है।
इस CPU के अंदर अलग- अलग काम करने वाले उपकरण लगे होते हैं जैसे चिप, पीसीबी सर्क्टिस इत्यादि। इसमें सर्व प्रमुख हैं संगणक का मस्तिष्क अर्थात प्रोसेसर चिप। इसे भी अपने कामको संभालनेके लिये एक स्लेट चाहिये, जो रॅम डिस्क है और हमारे किये काम की फाईलें संग्रहित कर रखने के लिये हार्ड डिस्क। प्रोसेसर और हार्ड डिस्कके लिये अच्छे हिंदी शब्द हैं -- विवेचक और संग्राहक।
संगणक खरीदते समय ही तय करना पडता है कि हमारी संगणक रूपी अलमारी अर्थात् संग्राहक डिस्क (हार्ड डिस्क) कितनी बडी होगी। जब हम उसे घर लाकर पहली बार सेटिंग करते हैं (या विक्रेता का इंजिनियर आकर कर देता हो, तभी संग्राहक डिस्कके दो या तीन भाग बना लेना चाहिये।
इन्हें   C, D  और E  ड्राइव्हका नाम देने का प्रचलन हैं। C ड्राइव्ह में सभी सॉफ्टवेअर प्रोग्राम  रखे जाते हैं। कभी कभी वे खराब हो जाते हैं तब  C  ड्राइव्हसे सारी फाइलें हटाकर दुबारा उस पर सभी प्रोग्राम लोड करने पडते हैं। इन प्रोग्रामों की सीडी भी मिल जाती है और उन्हें दुबारा लोड करने में कोई दिक्कत भी नही है। लेकिन इन प्रोग्रामों पर काम करके जो फाइलें हम बनाते हैं, उन्हें C  के बजाय  D  या E   ड्राइव्ह में रखना चाहिये ताकि जब हमें C  ड्राइव्ह की सफाई करनी हो , तब फाइलें सुरक्षित रहें। माय डॉक्यूमेंट और डेक्सटॉप, दोनों ही C  ड्राइव्हका हिस्सा हैं और बार बार काम करना हो तो सुविधाके लिये कई फाइलें सामान्यतया इन्ही में रखी जाती हैं। इसीलिये बीच बीच में फाइलों को वहाँ से निकालकर  D  ड्राइव्ह में डालना जरूरी है।

एक ही तरह कि फाइलों को एक गठरी में रखने में सुविधा है। इसके लिये हम संगणक पर कोई नई संचिका (न्यू फोल्डर) बना कर और उसे अच्छासा नाम देकर उसी एक प्रकारकी  मनचाही धारिकाएँ ( फाइलें) उसमें रख देते हैं। फिर यदि एक गठरी अर्थात संचिका (फोल्डर) को उठाकर दूसरे ड्राइव्ह में (या दूसरी संचिका में) रखते हैं तो उसकी सभी फाइलें अपने आप उधर चली जाती हैं। वरना हमें उन्हें एक एक करके उठाकर रखना पडता।

इंटरनेट से हम फाइलें तो भेज सकते हैं लेकिन गठरी(फोल्डर) नही। इसलिये यदि हम फोल्डर को झिप करें तो वह गठरी भी एक झिप-फाइल बन जाती है और उसका आकार भी छोटा हो जाता है । फिर उसे इंटरनेट पर भेजा जा सकता है। दूसरे सिरे पर उस फाइल को डाऊनलोड करके अनझिप करने पर गठरी और उसमें बाँधकर रखी धारिकाएँ वहाँ उपलब्ध हो जाती हैं।

अलमारी की ही तरह संगणक में भी ताला लगाने की व्यवस्था है। ताला किसी भी फाइल में, या फोल्डर में, या ड्राइव्ह में या फिर पूरे संगणक पर भी लगाया जा सकता है। ताला खोलनेकी चाबीको गुप्तशब्द कहा जाता है।

हर फाइल के लिये अलग अलग गुप्तशब्द हो सकता है, या फिर पूरे फोल्डर के लिये, या पूरे ड्राइव्ह के लिये और फिर भी चाहें तो  पूरे संगणक को खोलने के लिये भी गुप्तशब्द का उपयोग किया जा सकता है। ऐसा होने पर केवल वही व्यक्ति इन्हें खोलकर पढ सकेंगे जिन्हें गुप्तशब्द पता हो।

सामान्यतया हमें संगणक के प्रयोग में इतनी गुप्तता की आवश्यकता नही होती। लेकिन बँक, सुरक्षा से संबंधित फाइलें, कंपनियों के व्यवहार इत्यादि में गुप्तता की आवश्यकता होती है। ऐसे समय यह सुविधा काम आती है।
-----------------------------------------------------------------













ch 7 संगणक है टाईप राईटर -DTP done

(राजकमल)
भाग ७
संगणक है टाईप- रायटर

  संगणक का एक प्रमुख काम टाईप करने का है। लेकिन संगणक पर किया गया टाईपिंग सामान्य टाईप-रायटर की अपेक्षा दस गुना सरल और सौ गुना सुघड होता है।

    टाईपरायटर का अविष्कार होनेपर उसका उपयोग सन १८७३ में शुरू हुआ जो  १९९० तक चलता रहा । आज भी थोडाबहुत चल ही रहा है। इस यंत्र में एक  कुञ्जीपटल था । किसी अक्षरकी कुञ्जी खटकाने पर कुञ्जीसे  लगी एक डंडी आगे निकलकर सामने लगे कागज से टकराती थी। डंडी के सिरे पर वही अक्षर उलटकर उकेरा होता था और कागज के आगे काली स्याही की एक रिबन लगी होती थी। डंडी टकराने से कागजपर स्याहीसे वह अक्षर उभरता था। उसी समय कागज और रिबिन थोडासा आगे सरक जाते ताकि अगले अक्षर के लिये जगह तैयार हो। अंग्रेजी टाइपरायटरके कुञ्जी पटलमें तीन लाइनों पर अंग्रेजी के २६ अक्षर, चौथी ऊपरी लाईनमें सारे अंक, विरामचिह्न, इत्यादि होते थे। जैसे +  = इत्यादि।

लेकिन यह कुञ्जीपटल अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम के अनुसार नही था, वरन उसमें अक्षरोंका क्रम उलटा-पुलटा था। इसके दो कारण थे। अंग्रेजी वाक्य लिखते हुए कौनसे अक्षरोंका उपयोग अधिक होता है, उनके लिये कौनसी उंगली हो, साथ ही आठों उंगलियो से टाइप करते हुए यह भी देखना पडेगा कि अंगरेजी शब्दोमें सामान्यतः जो दो अक्षर एक के बाद एक आते हैं, उनकी डँडियाँ एक दूसरे से बहुत अलग-आलग हों ताकि वे आपस में उलझें नहीं। इस प्रकार काफी रिसर्च करने के बाद ही  कुञ्जीपटल पर अक्षरोंका अनुक्रम नियत हुआ जो वर्णमाला अनुक्रम abcd..... से नितान्त भिन्न था।

     अंग्रेजी टाइपरायटिंग के लिये अधिकतर querty अनुक्रम प्रयुक्त हुआ। इसकी पहली पंक्तिमें  क्रमसे  q,u,e,r,t,y   अक्षर आते हैं। कुछ अन्य अनुक्रमों वाले टाइपरायटर भी बने थे जो जर्मन, स्वीडिश आदि भाषाओंके के लिये अधिक उपयुक्त थे।लेकिन भारतमें चलनेवाले टाइपराइटरोंमें में सदा querty अनुक्रम का ही प्रयोग हुआ।

 जब संगणक बने और बनानेवाली कंपनियोंने पहचाना कि यह जल्दीही टाइपराइटरकी जगह ले लेगा  तो संगणक के कुञ्जीपटल पर भी वही टाइपराइटरवाला अनुक्रम रखा । इससे यह फायदा हुआ कि सारे टायपिस्ट बडी सरलता से संगणक पर टाईपिंग करने लगे।

टाईपरायटर के अविष्कार के अलावा छपाई काम के लिये अलग अलग नमूनोंके अक्षर आवश्यक होते हैं। इन्हें फॉण्ट कहते हैं। हिंदी में हम इन्हें वर्णाकृति कह सकते हैं। अंग्रेजीके कई जानेमाने लोकप्रिय फॉण्ट हैं जैसे एरियल, टाइम्स न्यू रोमन, ताहोमा, कॅलिब्री इत्यादि। छापखाने में इनकी बडी आवश्यकता होती है। लेकिन टाइपराइटर में एक ही तरह का और एक ही साइज का फॉण्ट लगाया जा सकता है, दूसरे फॉण्ट चाहिये तो  दूसरा टाईपरायटर ही खरीदना पडता था।

संगणक आने पर वे डंडियाँ और स्याहीमें डूबी रिबिन वगैरा सबकी आवश्यकता  समाप्त हो गई। संगणक का काम सीधे स्क्रीनपर देखा जाता है और इसके प्रिंटर भी डंडियों की बजाय इलेक्ट्रिक सिग्नल से चलते हैं। इसलिये संगणक के सिस्टममें कई तरह के फॉण्ट रखना सरल भी है और पर्याप्त भी। अब संगणक पर जाकर किसी भी अक्षर, शब्द, पंक्ति या परिच्छेद के लिये संगणक को आदेश दिया जा सकता है- फॉण्ट बदलकर  दूसरा फॉण्ट लगाओ, साइज बदलो, यहाँ  तक कि रंग और बॅकग्राउंड का रंग भी बदला जा सकता है। इस प्रकार जो भी लिखा गया उसे सुंदर ढंग से सजाया जा सकता है।

   इसी प्रकार जब हिन्दी टाईपरायटर बना तो उसकी कुञ्जियाँ भी हिन्दीके वर्णक्रम के अनुसार नही बल्कि उलटपुलटकर लगाई गई थीं और उनका क्रम रेमिंग्टन अनुक्रम नामसे सबका परिचित था। हालाँकि छपाई के लिये हिंदी भाषा में भी पहलेसे ही कई फॉण्टसेट बने पडे थे, लेकिन टाईपरायटर पर एक ही फॉण्टसेट रह सकता था। और उसका अनुक्रम भी एक खास तरीके उलटा- पुलटाकर रखना जरूरी था। इसी कारण हिंदी रेमिंग्टन टाइपराइटरका अनुक्रम और स्कूल की पहली कक्षा से जो अनुक्रम हम सीखते हैं, अर्थात कखगघङ..., दोनों अलग थे। रेमिंग्टन हिंदी अनुक्रम सीखने के लिये कमसे कम एक वर्ष का समय लगता था। लेकिन हिंदी टाइपिस्ट मेहनतसे उसे सीखकर उसका प्रयोग कर रहे थे। इस प्रकार  हिंदी टाइपराइटर भी वर्षोंसे चले आ रहे थे।

इसलिये संगणकपर हिंदी टंकनकी सुविधा बनानेवाले प्रोग्रामर्सने संगणक कुञ्जीपटलके लिये भी वही रेमिंग्टन अनुक्रम रख्खा ताकि जो वर्षोंसे टाईपरायटिंग कर रहे हैं उनका काम रुके बिना या कुछ नया सीखे बिना ही चलता रहे। टाईपिंग करनेवाले सारे हिंदी टायपिस्ट सरलता से संगणक का उपयोग शुरू कर सकें। 

लेकिन इन प्रोग्रामर्सने एक नेक, पुण्यका काम और भी किया । उन्होंने दो कुञ्जी-अनुक्रम और बनाये -- एक अनुक्रम इनस्क्रिप्ट हमारी वर्णमाला कखगघङ... के क्रमानुसार था और दूसरा रोमन फोनेटिक जो अंग्रेजी टाइपराइटर का ही क्रम  था।  इन वर्णक्रमोंके साथ उन्होंने कई सुंदर हिंदी फॉण्टसेट (वर्णाकृतिसमूह) भी उपलब्ध कराये ताकि टायपिंग सुंदर दिखे और उसमें विविधता हो।  एक खास बटनसे संगणक को बताया जा सकता है कि आप किस कुञ्जी-अनुक्रमसे काम करना चाहते हैं।

इनस्क्रिप्ट अनुक्रम बहुतही सरल व उपयोगी है। इसकी पहली मजा ये है कि स्कूलकी पहली कक्षामें हमें जो वर्णक्रम पढाया जाता है -- क,ख,ग.......क्ष,ज्ञ तथा अ,आ,इ,ई,उ,ऊ.... उसी क्रममें कुञ्जी-अनुक्रम भी बनाया ताकि आपको सीखनेमें घोकना न पडे, बल्कि कुञ्जी-अनुक्रम अनायासही यादमें बना रहे। टाईपरायटर सीखने वालोंको रेमिंग्टन अनुक्रमकी प्रॅक्टिसके लिये छः-आठ महिने लग जाते हैं, चाहे हिंदी सीख रहे हों या अंग्रेजी। लेकिन संगणकका इनस्क्रिप्ट हिंदी अनुक्रम बिना अभ्यासके ही दिमागमें फिट हो जाता है - बस पाँच मिनटोंमें, और इसके लिये अंग्रेजी सीखनेकी भी आवश्यकता नही। इस कारण जो बच्चे पाँचवींके बाद स्कूल नही जा सकते, अंग्रेजी नही पढ सकते वे भी कमसे कम समयमें डंकेकी चोटपर संगणक-हिन्दी-टायपिंग सीख सकते हैं। एक बार सीखकर कहीं भी टाईपिंगका व्यवसाय कर सकते हैं। 

इनस्क्रिप्ट अनुक्रम में दूसरी सरल  बात यह भी है कि  इसमे सारे स्वर बाँई उंगलियों पर व  प्रायः सारे व्यंजन दहिनी उंगलियों पर  रखे गये हैं। इसलिये हम व्यंजन-स्वर-व्यंजन- स्वर इस प्रकार दाईं-बाईँ अंगुलियोंसे टायपिंग करते चलते हैं जिससे तबले की तरह एक लय निर्माण होती है और सीखना अति-सरल हो जाता है।

इन दो के कारण रेमिंग्टनका उलटा पुलटा हिंदी अनुक्रम सीखने में जो एक सालका समय लगता है, उससे छुटकारा मिल गया। अब जिस टाईपिस्ट ने शुरू से वही सीखा था--  उसे तो  रेमिंग्टन हिंदी अनुक्रमकी सुविधा मिल गई  लेकिन नया सीखने वालेके लिये उसकी आवश्यकता नही रही। एक वर्ष का टायपिंग क्लास लगाने के बजाय पाँच  मिनिटों मे  इनस्क्रिप्ट अनुक्रम सीखा जा सकता है और स्पीड लाने के लिये एक महिना पर्याप्त है। 
      एक तीसरी सरलता यह भी है कि सारी भारतीय लिपियों की वर्णमाला अर्थात् अक्षर-अनुक्रम देवनागरी ही है। इसलिये एक बार यह अनुक्रम समझकर आत्मसात कर लेने पर हम केवल एक निर्देश मात्र से संगणक को बता सकते हैं कि अब मुझे हिंदी की जगह कन्नड या बंगाली या पंजाबी में लिखना है, और बिना किसी परेशानी के लिये हम  उसी प्रकार लिखते चलेंगे - केवल स्क्रीन पर दिखने वाला अक्षर कन्नड या उस उस लिपी से लिखा होगा।

इसका सर्वाधिक उपयोग संस्कृतके लिये है। यदि कोई श्लोक या परिच्छेद संस्कृत भाषा मे है, पर लिपी देवनगरी है तो उसे केवल एक निर्देश से बंगाली में बदलने पर वही संस्कृत लेखन बंगाली व्यक्ति अधिक सुगमतासे पढ सकता है। इस प्रकार भारतीय लिपियोंकी एकात्मता का अच्छा उपयोग इनस्क्रिप्ट में किया गया है। यह एका ही किसी ज्ञानको आगे बढाता है। मुझे कई बार लगता है कि इस अनुक्रम का नाम भी इनस्क्रिप्ट की बजाय देवनागरी या भारती रखा जाता तो कोई गलत नही होता। 

जब संगणक नही थे, केवल टाइप रायटर थे, तब हर भाषा में कुञ्जीपटलका अनुक्रम अलग था इसलिये जो मराठी टाइपिंग कर सकता  था, उसे कन्नड टाइपिंग अलग से सीखनी पडती थी लेकिन इनस्क्रिप्ट अनुक्रममे यह समस्या भी समाप्त हो गई।

फिर भी टाईपरायटर और संगणकमें  एक अन्तर याद रखना पडेगा। टाईपरायटर पर केवल टाईपिंग हो सकती है। संगणक पर कई काम हो सकते हैं। तो संगणकको अपने आप कैसे पता चलेगा कि हम टाइपिंग करना चाहते हैं, या गीत सुनना चाहते हैं या कुछ और?

इसलिये संगणक खोलनेपर यदि टाइपिंग करनी हो तो उसे बताना पडेगा कि वर्ड सॉफ्टवेअर खोलो। तब उसके पडदे पर नया कोरा कागज खुलेगा । फिर उसे बताना पडेगा कि हमें किस भाषा या किस लिपीमें और किस अनुक्रम से टाइप करना है, उसके बाद ही हम टाईपिंग आरंभ कर सकते हैं।

--------------------------------------------------------------------

 chp- 7
 संगणक है टाईप- रायटर

  संगणक का एक प्रमुख काम टाईप करने का है। लेकिन संगणक पर किया गया टाईपिंग सामान्य टाईप-रायटर की अपेक्षा दस गुना सरल और सौ गुना सुघड होता है।

    टाईपरायटर का अविष्कार होनेपर उसका उपयोग सन…. में शुरू हुआ जो  १९९० तक चलता रहा । आज भी थोडाबहुत चल ही रहा है। इस यंत्र में एक  कुञ्जी पटल था । एक कुञ्जी खटकाने पर एक डंडी आगे निकलकर सामने लगे कागज से टकराती थी। डंडी के सिरे पर वही अक्षर उलटकर उकेरा होता था और कागज के आगे काली स्याही की एक रिबन लगी होती थी। डंडी टकराने से कागजपर स्याहीसे वह अक्षर उभरता था। उसी समय कागज और रिबिन थोडासा आगे सरक जाते ताकि अगले अक्षर के लिये जगह तैयार हो। अंग्रेजी टाइपरायटरके कुञ्जी पटलमें तीन लाइनों पर अंग्रेजी के २६ अक्षर, चौथी लाईनमें सारे अंक, विरामचिह्न, इत्यादि होते थे। , जैसे + या = इत्यादि।

लेकिन यह कुञ्जी पटल अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम के अनुसार नही था, वरन उसमें अक्षरोंका क्रम उलटा-पुलटा था। इसके दो कारण थे। अंग्रेजी वाक्य लिखते हुए कौनसे अक्षरोंका उपयोग अधिक होता है, उनके लिये कौनसी उंगली हो, साथ ही   आठों उंगलियो से टाइप करते हुए यह भी देखना पडेगा कि सामान्यतः शब्दोमें जो दो अक्षर बार-बार एक के बाद एक आते हैं, उनकी डँडियाँ एक दूसरे से बहुत अलग-आलग हों ताकि वे आपस में उलझें नहीं। इस प्रकार काफी रिसर्च करने के बाद ही  कुञ्जी पटल पर अक्षरोंका अनुक्रम नियत हुआ जो वर्णमाला अनुक्रम abcd से नितान्त भिन्न था।

     अंग्रेजी टाइपरायटिंग के लिये अधिकतर querty अनुक्रम प्रयुक्त हुआ। इसकी पहली पंक्तिमें  क्रमसे  q,u,e,r,t,y   अक्षर आते हैं। कुछ अन्य अनुक्रमों वाले टाइपरायटर भी बने थे जो जर्मन, स्वीडिश आदि भाषाओंके के लिये अधिक उपयुक्त थे।लेकिन भारत में सदा querty अनुक्रम का ही प्रयोग हुआ।

    संगणक के कुञ्जीपटल पर भी यही अनुक्रम रखनेसे यह फायदा हुआ कि सारे टायपिस्ट बडी सरलता से संगणक पर टाईपिंग करने लगे।

टाईपरायटर के अविष्कार के अलावा छपाई काम के लिये अलग अलग नमुनोंके अक्षर आवश्यक थे। इन्हें फॉण्ट कहते हैं। हिंदी में हम इन्हें वर्णाकृती कह सकते हैं। अंग्रेजीके कई जानेमाने लोकप्रिय
फॉण्ट हैं जैसे एरियल, टाइम्स न्यू रोमन, ताहोमा, कॅलिब्री इत्यादि। छापखाने में इनकी बडी आवश्यकता होती थी। लेकिन टाइपराइटर में एक ही तरह का और एक ही साइज का फॉण्ट लगाया जा सकता है, दूसरे फॉण्ट चाहिये तो  दूसरा टाईपरायटर ही खरीदना पडता था।

संगणक आने पर वे डंडियाँ और स्याहीमें डूबी रिबिन वगैरा सबकी आवश्यकता  समाप्त हो गई। संगणक का काम सीधे स्क्रीनपर देखा जाता है और इसके प्रिंटर भी डंडियों की बजाय इलेक्ट्रिक सिग्नल से चलते हैं। इसलिये संगणक के सिस्टममें कई तरह के फॉण्ट रखना सरल भी है और पर्याप्त भी। अब संगणक पर जाकर किसी भी अक्षर, शब्द, पंक्ति या परिच्छेद के लिये संगणक को आदेश दिया जा सकता है- फॉण्ट बदलकर  दूसरा फॉण्ट लगाओ, साइज बदलो, यहाँ  तक कि रंग और बॅकग्राउंड का रंग भी बदला जा सकता है। इस प्रकार जो भी लिखा गया उसे सुंदर ढंग से सजाया जा सकता है।

   जब हिन्दी टाईपरायटर बना तो उसकी कुञ्जियाँ भी हिन्दीके वर्णक्रम के अनुसार नही थीं। लेकिन जो भी क्रम था वह सभी टाईपरायटरोंपर एक ही था। यह रेमिंग्टन अनुक्रम नामसे सबका परिचित था। हालाँकि हिंदी भाषा में भी  छपाई के लिये कई फॉण्टसेट बने, लेकिन टाईपरायटर पर एक ही फॉण्ट रह सकता था। और उसका अनुक्रम भी एक खास तरीके से रखना जरूरी था। स्कूल की पहली कक्षा से जो अनुक्रम हम सीखते हैं, अर्थात कखगघङ, उसे उलटा पुलटा कर हिंदी का रेमिंग्टन अनुक्रम बना था। इसे सीखने के लिये कमसे कम एक वर्ष का समय लगता था। लेकिन वर्षोंसे हिंदी टाइपराइटर चले आ रहे थे और हिंदी टाइपिस्ट मेहनतसे सीखकर उसका प्रयोग कर रहे थे।

इसलिये संगणक बनानेवालोंने इसके कुञ्जीपटलके लिये भी वही रेमिंग्टन अनुक्रम रख्खा ताकि जो वर्षोंसे टाईपरायटिंग कर रहे हैं उनका काम रुके बिना या कुछ नया सीखे बिना ही चलता रहे। टाईपिंग करनेवाले सारे हिंदी टायपिस्ट सरलता से संगणक का उपयोग शुरू कर सकें। 

लेकिन इन प्रोग्रामर्सने एक नेक, पुण्यका काम और भी किया । उन्होंने दो अनुक्रम और बनाये - एक अनुक्रम इनस्क्रिप्ट हमारी वर्णमाला कखगघङ के क्रमपर था और दूसरा रोमन फोनेटिक जो अंग्रेजी टाइपराइटर का ही क्रम  था।  इन वर्णक्रमोंके साथ उन्होंने कई सुंदर हिंदी फॉण्टसेट (वर्णाकृतीसंच) भी उपलब्ध कराये ताकि टायपिंग सुंदर दिखे और उसमें विविधता हो।  एक खास बटनसे संगणक को बताया जा सकता है कि आप किस कुञ्जी-अनुक्रमसे काम करना चाहते हैं।

इनस्क्रिप्ट अनुक्रम बहुतही सरल व उपयोगी है। इसकी पहली मजा ये है कि स्कूलकी पहली कक्षामें हमें जो वर्णक्रम पढाया जाता है -- क,ख,ग.......क्ष,ज्ञ तथा अ,आ,इ,ई,उ,ऊ.... उसी क्रममें कुञ्जी-अनुक्रम भी बनाया ताकि आपको सीखनेमें घोकना न पडे, बल्कि कुञ्जी-अनुक्रम अनायासही यादमें बना रहे। टाईपरायटर सीखने वालोंको रेमिंग्टन अनुक्रमकी प्रॅक्टिसके लिये छः-आठ महिने लग जाते हैं, हिंदी हो या अंग्रेजी। इनस्क्रिप्ट अनुक्रम बिना अभ्यासके ही दिमागमें फिट हो जाता है - बस पाँच मिनटोंमें, और इसके लिये अंग्रेजी सीखनेकी भी आवश्यकता नही। इस कारण जो बच्चे पाँचवींके बाद स्कूल नही जा सकते, अंग्रेजी नही पढ सकते वे भी कमसे कम समयमें डंकेकी चोटपर संगणक-हिन्दी-टायपिंग सीख सकते हैं। एक बार सीखकर कहीं भी टाईप का व्यवसाय कर सकते हैं। 

इनस्क्रिप्ट अनुक्रम में दूसरी सरल  बात यह भी है कि  इसमे सारे स्वर बाँई उंगलियों पर व  प्रायः सारे व्यंजन दहिनी उंगलियों पर  रखे गये हैं। इसलिये हम व्यंजन-स्वर-व्यंजन- स्वर इस प्रकार दाईं-बाईँ अंगुलियोंसे टायपिंग करते चलते हैं जिससे तबले की तरह एक लय निर्माण होती है और सीखना अति-सरल हो जाता है।

इन दो के कारण रेमिंग्टनका उलटा पुलटा हिंदी अनुक्रम सीखने में जो एक सालका समय लगता है, उससे छुटकारा मिल गया। अब जिस टाईपिस्ट ने शुरू से वही सीखा था-  उसे तो वही सुविधा मिल गई  लेकिन नया सीखने वाले के लिये उसकी आवश्यकता नही रही। एक वर्ष का टायपिंग क्लास लगाने के बजाय पाँच  मिनिटों मे  इनस्क्रिप्ट अनुक्रम सीखा जा सकता है और स्पीड लाने के लिये एक महिना पर्याप्त है। 
      एक तीसरी सरलता यह भी है कि सारे भारतीय लिपियों की वर्णमाला अर्थात् अक्षर अनुक्रम देवनागरी ही है। इसलिये एक बार यह अनुक्रम समझकर आत्मसात कर लेने पर हम केवल एक निर्देश मात्र से संगणक को बना सकते हैं कि अब मुझे हिंदी की जगह कन्नड या बंगाली या पंजाबी में लिखना है, और बिना किसी परेशानी के लिये हम  उसी प्रकार लिखते चलेंगे - केवल स्क्रिन पर दिखने वाला अक्षर कन्नड या उस उस लिपी से लिखा होगा।

इसका सर्वाधिक उपयोग संस्कृतके लिये है। यदि कोई श्लोक या परिच्छेद संस्कृत भाषा मे है, पर लिपी देवनगरी है तो उसे केवल एक निर्देश से बंगाली में बदलने पर वही संस्कृत लेखन बंगाली व्यक्ति अधिक सुगमतासे पढ सकता है। इस प्रकार भारतीय लिपियोंकी एकात्मता का अच्छा उपयोग इनस्क्रिप्ट में किया गया है। यह एका ही किसी ज्ञानको आगे बढाता है। मुझे कई बारलगता है कि इस अनुक्रम का नाम भी इनस्क्रिप्ट की बजाय देवनागरी रखा जाता तो कोई गलत नही होता। 

जब संगणक नही थे, केवल टाइप रायटर थे, तब हर भाषा में कुञ्जी पटलका अनुक्रम अलग था इसलिये जो मराठी टाइपिंग कर सकता  था, उसे कन्नड टाइपिंग अलग से सीखनी पडती थी लेकिन इनस्क्रिप्ट अनुक्रम मे यह समस्या भी समाप्त हो गई।

फिर भी टाईपरायटर और संगणकमें  एक अन्तर याद रखना पडेगा। टाईपरायटर पर केवल टाईपिंग हो सकती है। संगणक पर कई काम हो सकते हैं। तो संगणकको अपने आप कैसे पता चलेगा कि हम टाइपिंग करना चाहते हैं, या गीत सुनना चाहते हैं या कुछ और?

इसलिये संगणक खोलनेपर यदि टाइपिंग करनी हो तो उसे बताना पडेगा कि वर्ड सॉफ्टवेअर खोलो। तब उसके पडदे पर नया कोरा कागज खुलेगा । फिर उसे बताना पडेगा कि हमें किस भाषा या किस लिपीमें और किस अनुक्रम से टाइप करना है, उसके बाद ही हम टाईपिंग आरंभ कर सकते हैं।

--------------------------------------------------------------------













Sunday, January 1, 2012

ch 8 संगणक है हरफनमौला -DTP done

राजकमल
भाग ८
संगणक है हरफन मौला

   दूसरे यंत्र  केवल अपना अपना नियत काम ही कर सकते हैं लेकिन संगणक कई तरह के काम कर सकता है। हर अलग काम के लिये उसके पास एक अलग प्रोग्राम होता है। प्रोग्राम को खोलकर हम संगणक से वह काम करवा सकते हैं। इसीलिये संगणक हरफन मौला है।

   संगणक से जो काम बार-बार करवाना हैउसकी चित्राकृति या चित्रांकन को डेस्कटॉप रखने में सुविधा है। चित्रांकन पर टिकटिकानेसे प्रोग्राम खुलता है और काम शुरू होता है। साधारणतया हम संगणक से ये काम बारबार करवाते हैं ---
  • टंकलेखन अर्थात टाइपिंग काम के लिये वर्ड प्रोग्राम के चित्रांकनपर टिकटिकाना
  • गाना सुननेके लिये मिडिया - प्लेअर के चित्रांकनपर टिकटिकाना
  • चित्रकारी करने के लिये पेंट या क्लिप-आर्ट प्रोग्राम के चित्रांकनपर
  • इंटरनेट से संदेश भेजने या आया हुआ संदेश पढने के लिये  गूगल क्रोम या इंटरनेट एक्सप्लोअररके चित्रांकन पर 
  • सारणी अर्थात चार्ट तैयार करने के लिये एक्सेल प्रोग्राम के चित्रांकन पर
  • पहले काम की हुई धारिकाएँ (फाइल) देखने के लिये "माय-डॉक्यूमेंट" के चित्रांकन पर टिकटिकाने से सारी धारिकाओं की सूची खुल जाती है फिर उसमें से चाहे जिसपर टिकटिकानेसे वह धारिका खुलती है और उसीका अगला काम किया जा सकता है।
  • माय- कॅम्प्यूटर के चित्रांकन पर टिकटिकाने से संगणक में कहाँ कहाँ क्या रखा गया है, वह सारा जाना जा सकता हैं।
  • स्टार्ट के चित्रांकन पर टिकटिकाने से क्या होता है? यह मजेदार बात हैं क्योंकि संगणक तो पहले से ही खुला है, फिर स्टार्ट बटन का क्या काम? लेकिन यह बात नही है। स्टार्ट का चित्रांकन टिकटिकाने पर और कई चित्रांकन सामने आते हैं और इसी में एक शट डाउनका भी चित्रांकन  होता है। उसपर टिकटिकाकर संगणक बंद किया जा सकता है। जैसे उसे  खुलने के लिये थोडी तैयारी और थोडा समय चाहिये वैसे ही बंद होनेके लिये भी। इसी लिये शट डाउन का  आदेश लेकर संगणक जब अपने आप को बंद कर ले तो उसके  बाद ही बिजली का स्विच बंद करना चाहिये वरना उसमें संग्रहित सामग्री खराब होने का डर रहता है।
  • संगणक के पास कचरादानी भी होता है जिसका नाम है रिसायकल बिन। जब हम किसी फाईल को डिलीट करते है, तब वह फाईल कचरादानी में चली जाती हैं। रिसाइकल बिन के चित्रांकन को टिकटिकाने पर उसमें डिलीट की गई फाइलों की सूची मिल जाती है। यदि उसमेंसे कोई फाइल वापस चाहिये, तो ‘रिस्टोअर’ (restore) करने पर वह संगणक में वापस आ जाती है। जब रिसाइकल बिन से फाईल को दुबारा डिलीट करा जाता है तभी वह संगणक से पूरी तरह निकाल दी जाती है। वरना वह संगणक में जगह छेक कर रहती है। इसी लिये बीच बीच में रिसाइकिल बिन को खोलकर अनावश्यक फाईलोंको निकाल देना चाहिये।
इसी प्रकार संगणक द्वारा वीडियो देखना, वीडियो बनाना , चित्र देखना या बनाना, धारिकाओंकी गठडी बनाना या उसे  कसकर बांधकर उसका आकार छोटा करना, इत्यादि काम करने के लिये संबंधित प्रोग्राम होते हैं। उनके चित्रांकन पर टिकटिकाकर प्रोग्राम शुरू कर सकते हैं या पहले के अधूरे कामको आगे बढा सकते हैं।
--------------------------------------------------------------

Chp-8
संगणक है हरफन मौला

   दूसरे यंत्र  केवल अपना अपना नियत काम ही कर सकते हैं लेकिन संगणक कई तरह के काम कर सकता है। हर अलग काम के लिये उसके पास एक अलग प्रोग्राम होता है। प्रोग्राम को खोलकर हम संगणक से वह काम करवा सकते हैं। इसी लिये यह हरफन मौला है।

   संगणक से जो काम बार-बार करवाना हैउसके कृतीचित्र या चित्रांकन को डेस्कटॉप रखने में सुविधा है। चित्रांकन पर टिकटिकानेसे प्रोग्राम खुलता है और काम शुरू होता हैं। साधारणतया हम संगणक से

  • लेखन अर्थात टाइपिंग काम के लिये वर्ड प्रोग्राम के चित्रांकनपर टिकटिकाना
  • गाना सुननेके लिये मिडिया - प्लेअर के चित्रांकनपर टिकटिकाना
  • चित्रकारी करने के लिये पेंट या क्लिप- आर्ट प्रोग्राम के चित्रांकनपर
  • इंटरनेट से संदेश भेजने या आया हुआ संदेश पढने के लिये इंटरनेट एक्सप्लोअरर या गूगल क्रोमके चित्रांकन पर 
  • सारणी अर्थात चार्ट तैयार करने के लिये एक्सेल प्रोग्राम के चित्रांकन पर
  • पहले काम की हुई धारिकाएँ (फाइल) देखने के लिये "माय-डॉक्यूमेंट" के चित्रांकन पर टिकटिकाने से सारी धारिकाओं की सूची खूल जाती है फिर उसमें से चाहे जिसपर टिकटिकानेसे वह खुलती है और उसीका अगला काम किया जा सकता है।
  • माय- कॅम्प्यूटर के चित्रांकन पर टिकटिकाने से संगणक में कहाँ कहाँ क्या रखा गया है, वह सारा जाना जा सकता हैं।
  • स्टार्ट के चित्रांकन पर टिकटिकाने से क्या होता है? यह मजेदार बात हैं क्योंकि संगणक तो पहले से ही खुला हैं, फिर स्टार्ट बटन का क्या काम? लेकिन यह बात नही है। स्टार्ट का चित्रांकन टिकटिकाने पर और कई चित्रांकन सामने आते हैं और इसी में एक शट डाउनका भी चित्रांकन  होता है। उसपर टिकटिकाकर संगणक बंद किया जा सकता है। जैसे उसे  खुलने के लिये थोडी तैयारी और थोडा समय चाहिये वैसे ही बंद होनेके लिये भी। इसी लिये शट डाउन का  आदेश लेकर संगणक जब अपने आप को बंद कर ले उसके  बाद ही बिजली का स्विच बंद करना चाहिये वरना उसमें संग्रहित सामग्री खराब होने का डर रहता है।
  • संगणक के पास कचरादानी भी होता है जिसका नाम है रिसायकल बिन। जब हम किसी फाईल को डिलीट करते है, तब वह फाईल कचरादानी में चली जाती हैं। रिसाइकल बिन के चित्रांकन को टिकटिकाने पर उसमें डिलीट की गई फाइलों की सूची मिल जाती है। यदि उसमेंसे कोई फाइल चाहिये, तो ‘रिस्टोअर’ (restore) करने पर वह संगणक में वापस आ जाती है। जब रिसाइकल बिन से फाईल को दुबारा डिलीट करा जाता है तभी वह संगणक से पूरी तरह निकाल दी जाती है। वरना वह संगणक में जगह छेक कर रहती है। इसी लिये बीच बीच में रिसाइकिल बिन को खोलकर अनावश्यक फाईलोंको निकाल देना चाहिये।

इसी प्रकार संगणक द्वारा व्हिडियो देखना, व्हिडियो बनाना , चित्र देखना या बनाना, फाइलोंकी गठडी बनाना और फाइलोंको  कसकर बांधकर उसका आकार छोटा करना, इत्यादि काम करने के लिये संबंधित प्रोग्राम होते हैं। उनके चित्रांकन पर टिकटिकाकर प्रोग्राम शुरू कर सकते हैं या पहले के अधूरे कामको आगे बढा सकते हैं।
--------------------------------------------------------------





















ch 6 संगणक है पोस्टमन DTP done


     संगणक है पोस्टमन (राजकमल)

संगणक केवल पोस्टमन ही नही बल्कि डाक- विभाग ही है, क्यों कि डाक विभाग की ही तरह अनेक सारे काम कर सकता है। यही हमारे घर का पोस्ट बॉक्स है, यही पोस्टमास्तर है, पत्रोंको ले जानेवाला हवाई जहाज या कूरियर भी यही है और घर में डाक लानेवाला डाकिया भी यही है।

यह सारे काम संगणक करता है टेलीफोन विभाग की मदद से। जैसे हम टेलीफोन विभाग में पैसे भरकर एक टेलीफोन घर पर ले आते हैं, वैसे ही थोडे और पैसे भरकर एक राऊटर (या उसका छोटा भाई मोडेम) भी ले आते हैं।

राऊटर या मोडेम यंत्रकी एक तार टेलीफोन के सॉकेटमें और दूसरी तार संगणक के कार्यकारी बक्से में मोडेम के लिये बने प्लग में जोडते हैं। फिर अपना संदेश संगणक से राऊटर में, उसके मार्फत टेलीफोन एक्सचेंजमें, वहाँ से टेलीफोन की तारोंकी मार्फत दूरदराज के गाँव के टेलीफोन एक्सचेंज में, वहाँ से हमारे मित्रके राऊटर में और फिर मित्रके संगणक में पहुँचता है। अर्थात् यदि अपने संगणक को पोस्टमन बनाकर उसके मार्फत दुनियाँ भर में संदेश भेजने हों, तो पहले अपने संगणक में एक राऊटर लगाना पडेगा। लेकिन केवल इतना काफी नही है, कुछ और इन्तजाम भी करने पडेंगे। सबसे पहले संगणक में लिखा गया संदेश राऊटर की भाषा में बदलनेके लिये या ये कहें कि राऊटर तक पहुँचाने के लिये एक सॉफ्टवेअरकी आवश्यकता होगी। ऐसे सर्वाधिक प्रचालित सॉफ्टवेअर जैसे, फायरफॉक्स, गूगलक्रोम और इंटरनेट एक्सपलोअरर प्रायः संगणक की ऑपरेटिंग सिस्टम में ही लगे होते हैं। तो ये हुआ हमारे संदेशको डाकघरतक पहुँचानेका काम।

लेकिन किसीको डाक - व्यवस्थापन भी करना पडेगा । तो यह करनेवाली कंपनियाँ अलग होती है। आजकलकी प्रचलित कंपनीयाँ हैं गूगल, याहू, हॉटमेल, रेडिफ मेल इत्यादि।

तो तुमने देखा कि यह काम तीन जगहों पर बँटा हैं। एक तो टेलीफोनी क्षेत्रमें काम करनेवाली वे कंपनियाँ जिनके बिछाये तार, यंत्र, इत्यादि उपकरण हमारे संदेशको इलेक्ट्रानिकीके माध्यम से लाते- ले जाते हैं। दूसरा हमारे या मित्र के संगणक में लगा सॉफ्टवेअर और तीसरी संदेशोंका व्यवस्थापन करनेवाली कंपनियाँ। इसे हम यों समझ सकते हैं कि मुंबई से दिल्ली जानेवाले खत तो हवाई जहाज से चले जायेंगे। लेकिन किस व्यक्ति के पतेपर पहुँचाना है, उस पतेपर पहुँचनेका रास्ता डाकिये को मालूम है या नही, पत्र पर डाक- टिकट लगा है या नही, पता न मिलने पर डाक को लौटाना, इत्यादी सारे कामोंका व्यवस्थापन पोस्ट विभाग के कर्मचारी करते हैं - इसके लिये एक व्यवस्था बनाते हैं। उसी तरह गूगल इत्यादि कंपनियाँ हमारे संदेशोंका व्यवस्थापन करती हैं।

अपने घर के संगणकमें राऊटर जोडकर जब हम गूगल क्रोम या फायरफॉक्स खोलते हैं, तो अपने आप ही व्यवस्थापन कंपनी में से किसी का पता उस पर लिखकर आ जाता है। यदि नही आये तो हम स्वयं लिख सकते हैं। साधारणतया इसका स्वरूप http://www.gmail.com के प्रकारका होता है। इसे उस कंपनीका संकेतस्थल कहते हैं। बस समझ लो कि यही उस कंपनीका हेड ऑफिस है।
अब यदि हमें यह स्वीकार है कि हमारे संदेशोंका व्यवस्थापन यह कंपनी करेगी तो सबसे पहले उन्हें अपनी इच्छा बतानी पडेगी और अपने आप को उनकी सूच में रजिस्टर करना पडेगा। उन्हें अपनी कोई पहचान भी बतानी पडेगी।
इसका तरीका यों है कि किसी कंपनी का संकेत स्थल खोलो। तुरंत उस कंपनीका संक्षिप्त परिचय देनेवाला एक पन्ना खुलेगा जिसमें हमें रजिस्ट्रेशन के लिये निमंत्रण भी होगा । जहाँ कहीं लिखा हो साइन-अप, वहीं हमे टिकटिकाना है। फिर एक नया पन्ना खुलेगा जो वास्तव में रजिस्ट्रेशन का फॉर्म है। इसमें आपकी कुछ प्राथमिक जानकारी पूछी जायगी और आपका संकेतनाम और गुप्त चिह्न भी पूछा जायेगा। जरूरी नहीं है कि संकेतनामके लिये हम अपना असली नाम लिखें। जैसे मैंने गूगल कंपनीके साथ अपना संकेतनाम दिया है avahan जबकि मेरा नाम है leena mehendale । अब मुझे अपना गुप्तशब्द भी चुनकर उन्हें बताना है। तो मान लो कि मैंने गुप्तशब्द चुना jayhind . इस प्रकार मेरा ईमेल का पता हुआ avahan@gmail.com और इसके लिये मेरा गुप्तशब्द हुआ jayhind । फॉर्म भर लेनेपर उसी पन्ने के नीचे लिखा Submit बटन भी टिकटिकाना है। इस प्रकार गूगलपर मेरा रजिस्ट्रेशन हो गया। यह काम आरंभ में एक बार ही करना पडता है, बार-बार नही। हाँ, अपना गुप्तशब्द हम कभी भी बदल सकते हैं - बशर्ते उन्हें बताकर बदलें ।
इस प्रकार गूगलपर मेरा खाता खुल गया और रजिस्टर हो गया। अब कभी भी मैं गूगलका संकेतस्थल खोलूं तो Sign up के बजाय Sign in को टिकटिकाउंगी। इससे एक नई खिडकी खुलेगी जिसमें दो खाली जगहें होंगी।
पहलेमें मुझे लिखना है अपना संकेतनाम avahan और दूसरी में jayhind। ये दोनों अंग्रेजीमें लिखने पडेंगे। जब हम गुप्तशब्द लिखते हैं तो संगणकपर केवल ***** अर्थात् बिन्दू बिन्दू ही दिखेंगे--- हमारा गुप्तशब्द नही दिखेगा। इसलिये अगल बगल में कई लोग हों भी तो वे संगणक पर हमारा गुप्तशब्द नही पढ पायेंगे। हमें अपना ईमेल पता तो सबको बताना चाहिये ताकि लोग संदेश भेज सकें लेकिन गुप्तशब्द कभी नही बताना चाहिये।
हम एक ही कंपनी के साथ कई संकेतनामोंसे रजिस्टर हो सकते हैं- और कई कंपनियों के साथ भी। जिस प्रकार हमारा डाकपता कई दूसरे कामों के लिये उपयोगी होता है इसी प्रकार ईमेल पता भी कई कामोंके लिये उपयोगी होता है।

इस उदाहरणमें मेरा ईमेल पता हुआ avahan@gmail.com और गुप्तशब्द हुआ jayhind । यहाँ @ को at the rate of पढा जाता है और यह अक्षर इतना कारगर हो गया है कि सभी की-बोर्डों पर इसकी कुञ्जी होती ही है।

अब मैं किसी भी संगणक पर गूगल के संकेतस्थल पर जाकर sign in की पंक्तियों पर अपना संकेतनाम और गुप्तशब्द लिखूँ तो मेरी व्यक्तिगत डाकपेटी (इनबॉक्स) का पन्ना खूलेगा। उसमें “Compose mail” बटन को टिकटिकाने पर एक नया पन्ना खूलेगा जिसमें पत्र की ही तरह बाकायदा पता लिखने की जगह और संदेश लिखने के लिये अलग जगह होगी। इसमें संदेश लिखकर यदि मैंने पते की पंक्ति में लिखा avahan@gmail.com तो वह पत्र मुझे ही भेजा जायगा। अब यदि मैं उसी पन्ने पर बाँई ओर लिखे inbox के बटन को टिकटिकाउँ तो मैं अपना पत्र पढ सकती हूँ। अपने मित्र को पत्र भेजना हो तो उसका ईमेल पता लिखना पडेगा।
मेरे ईमेल पते पर मुझे कोई भी पत्र भेज सकता है। लेकिन मेरी डाकपेटी खोलने के लिये मेरा गुप्तशब्द चाहिये जो केवल मुझे ज्ञात है।
इस प्रकार ईमेल का काम सीखने में अधिक समय नही लगता। यहाँ लिखा विवरण पढने में जितनी देर लगी उससे कम समय में यह सब कुछ सीखा जा सकता है।
--------------------------------------------------------------









 Chp. 6
       संगणक है पोस्टमन

संगणक केवल पोस्टमन ही नही बल्कि डाक- विभाग ही है, क्यों कि डाक विभाग की ही तरह अनेक सारे काम कर सकता है। यही हमारे घर का पोस्ट बॉक्स है, यही पोस्टमास्तर है, पत्रोंको ले जानेवाला हवाई जहाज  या कूरियर भी यही है और घर में डाक लानेवाला डाकिया भी यही है।
यह सारे काम संगणक करता है टेलीफोन विभाग की मदद से।  जैसे हम टेलीफोन विभाग में पैसे भरकर एक टेलीफोन घर पर ले आते हैं, वैसे ही थोडे और पैसे भरकर एक मोडेम(या उसका बडा भाई राऊटर) भी ले आते हैं।

मोडेम यंत्रकी एक तार टेलीफोन के सॉकेटमें और दूसरी तार संगणक के कार्यकारी बक्से में मोडेम के लिये बने प्लग में जोडते हैं। फिर अपना संदेश संगणक के कार्यकारी बक्सेसे मोडेम में, उसके मार्फत टेलीफोन एक्सचेंजमें वहाँ से टेलीफोन की तारोंकी मार्फत दूरदराज के गाँव के टेलीफोन एक्सचेंज में, वहाँ से हमारे मित्रके मोडेम में और फिर मित्रके संगणक में पहुँचता है।    अर्थात् यदि अपने संगणक को पोस्टमन बनाकर उसके मार्फत दुनियाँ भर में संदेश भेजने हों, तो पहले अपने संगणक में एक मोडेम लगाना पडेगा। लेकिन केवल इतना काफी नही है, कुछ और इन्तजाम भी करने पडेंगे। सबसे पहले संगणक में लिखा गया संदेश मोडेमकी भाषा में बदलनेके लिये या ये कहें कि मोडेम तक पहुँचाने के लिये एक सॉफ्टवेअरकी आवश्यकता होगी।  ऐसे सर्वाधिक प्रचालित सॉफ्टवेअर इंटरनेट एक्सपलोअरर, फायरफॉक्स और गूगलक्रोम  प्रायः संगणक की ऑपरेटिंग सिस्टम में ही लगे होते हैं। लेकिन


जिसे डाक -  व्यवस्थापन कहा जा सकता है, उसे करनेवाली कंपनियाँ अलग होती है। इनमेंसे लोकप्रिय कंपनीयाँ हैं  गूगल, याहू, हॉटमेल रेडिफ मेल इत्यादि ।
इस प्रकार यह काम तीन जगहों पर बँटा हैं।  एक तो टेलीफोनी क्षेत्रमें काम करनेवाली वे  कंपनियाँ जिनके बिछाये तार, यंत्र, इत्यादि उपकरण हमारे संदेशको इलेक्ट्रानिकीके माध्यम से लाते- ले जाते हैं। दूसरा हमारे या मित्र के संगणक में लगा सॉफ्टवेअर और तीसरा काम करती हैं वो कंपनियाँ  जो संदेशोंका व्यवस्थापन करती हैं। इसे हम यों समझ सकते हैं कि मुंबई से दिल्ली जानेवाले खत चले तो जायेंगे हवाई जहाज से। लेकिन किस व्यक्ति के पतेपर पहुँचाना है, उस पतेपर पहुँचनेका रास्ता डाकिये को मालूम है या नही, पत्र पर डाक- टिकट लगा है या नही , पता न मिलने पर डाक को  लौटाना, इत्यादी सारे कामोंका व्यवस्थापन पोस्ट विभाग के आदमी करते हैं  - इसके लिये एक व्यवस्था बनाते हैं। वैसे ही गूगल इत्यादि कंपनियाँ हमारे संदेशोंका व्यवस्थापन करती हैं।

अपने घर के संगणकमें मोडेम जोडकर जब हम  गूगल क्रोम या फायरफॉक्स  खोलते हैं, तो अपने आप ही व्यवस्थापन कंपनी में से किसी का पता उस पर लिखकर आ जाता है। यदि नही आये तो हम स्वयं लिख सकते हैं। साधारणतया इसका स्वरूप http://www.yahoo.com के प्रकारका होता है। इसे उस कंपनीका संकेतस्थल कहते हैं। बस समझ लो कि यही उस कंपनीका  हेड ऑफिस है।
अब यदि हमें यह स्वीकार है कि हमारे संदेशोंका व्यवस्थापन यह कंपनी करेगी तो सबसे पहले, उन्हें बताना पडेगा और अपने आप को उनके रजिस्टर में रजिस्टर करना पडेगा। उन्हें अपनी कोई पहचान भी बतानी पडेगी।
    इसका तरीका यों है कि किसी कंपनी का संकेत स्थल खोलो। तुरंत उस कंपनीका संक्षिप्त परिचय देनेवाला एक पन्ना खुलेगा जिसमें  हमें रजिस्ट्रेशन के लिये निमंत्रण भी होगा । जहाँ लिखा हो साइन-अप , वहीं हमे टिकटिकाना है। फिर एक  नया पन्ना खुलेगा जो वास्तव में रजिस्ट्रेशन का फॉर्म है। इसमें आपकी कुछ प्राथमिक  जानकारी पूछी  जायगी और आपका संकेतनाम और गुप्त चिह्न भी पूछा जायेगा। जरूरी नहीं है कि  संकेतनामके लिये हम अपना असली नाम लिखें। जैसे मैंने याहू कंपनीके साथ अपना संकेतनाम दिया है leenameh  जबकि मेरा नाम है leenemehendale अब मुझे अपना गुप्तशब्द भी चुनकर उन्हें बताना है। तो मान लो कि मैंने गुप्तशब्द चुना jayhind . इस प्रकार मेरा ईमेल का पता हुआ leenameh@yahoo.com और इसके लिये मेरा गुप्तशब्द हुआ jayhind । फॉर्म भर लेनेपर उसी पन्ने के नीचे लिखा Submit बटन भी टिकटिकाना है। इस प्रकार याहू पर मेरा रजिस्ट्रेशन हो गया। यह काम आरंभ में एक बार ही करना पडता है, बार-बार नही। लेकिन कभी भी हम अपना गुप्तशब्द बदल सकते हैं - बशर्ते उन्हें बताकर बदलें ।  
इस प्रकार याहूपर मेरा खाता खुल गया और रजिस्टर हो गया। अब कभी भी मैं याहू का संकेतस्थल खोलूं तो Sign up   के बजाय Sign in को टिकटिकाउंगी। इससे एक नई खिडकी  खुलेगी जिसमें दो खाली जगहें होंगी।
पहलेमें मुझे लिखना है अपना संकेतनाम leenameh और दूसरी में jayhind। ये दोनों अंग्रेजीमें लिखने पडेंगे। जब हम गुप्तशब्द लिखते हैं तो संगणकपर केवल ***** बिन्दू बिन्दू ही दिखेंगे **** - हमारा गुप्तशब्द नही दिखेगा। इसलिये अगल बगल में कई लोग हों भी तो वे संगणक पर हमारा गुप्तशब्द नही पढ पायेंगे। हमेंअपना ईमेल पता तो सबको बताना चाहिये ताकि लोग संदेश भेज सकें लेकिन गुप्तशब्द कभी नही बताना चाहिये।
हम एक ही कंपनी के साथ कई संकेतनामोंसे रजिस्टर हो सकते हैं- और कई कंपनियों के साथ भी। जिस प्रकार हमारा पोस्टल पता कई दूसरे कामों के लिये उपयोगी होता है इसी प्रकार ईमेल पता भी कई कामोंके लिये उपयोगी होता है।
इस उदाहरणमें मेरा ईमेल पता हुआleenemeh@yahoo.com  और गुप्तशब्द हुआ  jayhind. यहाँ @ को at the rate of  पढा जाता है और यह अक्षर इतना कारगर हो गया है कि सभी की-बोर्डों पर इसकी कुञ्जीहोती है।
अब मैं किसी भी संगणक पर  याहू के संकेतस्थल पर जाकर sign in की पंक्तियों पर अपना संकेतनाम  और गुप्तशब्द लिखूँ तो मेरी व्यक्तिगत डाकपेटी का पन्ना खूलेगा।  उसमें “Compose mail” बटन को टिकटिकाने पर एक नया पन्ना खूलेगा जिसमें पत्र की ही तरह बाकायदा पता लिखने की जगह और संदेश लिखने की  आलग जगह होगी। इसमें संदेश लिखकर यदि मैंने पते की पंक्ति में लिखा leenameh@yahoo.com तो वह पत्र मुझे ही भेजा जायगा। अब यदि मैं उसी पन्ने पर बाँई ओर लिखे inbox के बटन को टिकटिकाउँ तो मैं अपना पत्र पढ सकती हूँ। अपने मित्र को पत्र भेजना हो तो उसका ईमेल पता लिखना पडेगा।
मेरे ईमेल पते पर मुझे कोई भी पत्र भेज सकता है। लेकिन मेरी डाकपेटी खोलने के लिये मेरा गुप्तशब्द चाहिये जो केवल मुझे ज्ञात है।
इस प्रकार ईमेल का काम सीखने में अधिक समय नही लगता। ये पन्ने पढने में जितनी देर लगी उससे कम समय में यह सब कुछ सीखा जा सकता है।
 ----------------------------------------------------------------------------------------------------------